Himachal News: हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन का प्रकोप अब स्पष्ट दिखने लगा है। सतलुज नदी घाटी में बर्फ का आवरण सिकुड़ने और ग्लेशियरों के तेजी से पीछे खिसकने के कारण हिमाचल प्रदेश के जलविद्युत उद्योग पर सीधा संकट खड़ा हो गया है। जलविद्युत राज्य के राजस्व का प्रमुख जरिया है, लेकिन इस नए भौगोलिक बदलाव ने बिजली उत्पादन की निरंतरता और जल सुरक्षा दोनों के लिए नई चुनौतियां पैदा कर दी हैं।
दरअसल, यह सनसनीखेज रिपोर्ट ‘स्टेट सेंटर ऑन क्लाइमेट चेंज’ (SCCC) द्वारा ‘हिमाचल प्रदेश काउंसिल फॉर साइंस, टेक्नोलॉजी एंड एनवायरनमेंट’ (HIMCOSTE) के तहत तैयार की गई है। ‘सतलुज जल विद्युत निगम लिमिटेड’ (SJVNL) के लिए किए गए इस अध्ययन का शीर्षक “कम्प्रिहेंसिव स्टडी ऑन इम्पेक्ट ऑफ क्लाइमेट चेंज ऑन वॉटर फ्लो पैटर्न अफेक्टिंग द जनरेशन ऑफ हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स” रखा गया है।

इस रिपोर्ट में 2010 से 2020 के दौरान उपग्रह से ली गई तस्वीरों, नदी के बहाव और तापमान रिकॉर्ड का गहराई से विश्लेषण किया गया है। अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि स्पिति, बसपा, अपर सतलुज और लोअर सतलुज उप-बेसिनों में ग्लेशियरों के क्षेत्रफल में लगातार गिरावट आई है।
वर्ष 2000 में सतलुज घाटी में ग्लेशियर का कुल क्षेत्रफल 1,481.75 वर्ग किलोमीटर था, जो 2020 में घटकर 1,384.16 वर्ग किलोमीटर रह गया। बढ़ते वैश्विक तापमान और बर्फबारी के बदले मिजाज के कारण ग्लेशियरों के पिघलने और पतले होने की रफ्तार काफी तेज हुई है। इस अध्ययन की सबसे चिंताजनक बात यह है कि पूरी सतलुज घाटी का एक भी हिस्सा जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से सुरक्षित नहीं बचा है।
बसपा उप-बेसिन में ग्लेशियरों की संख्या में भले ही कोई बड़ा फेरबदल न दिख रहा हो, लेकिन वहां भी बर्फ के खिसकने और पिघलने की निरंतर प्रक्रिया दर्ज की गई है। नराडू जैसे प्रमुख ग्लेशियरों का द्रव्यमान लगातार कम हो रहा है, जिससे साफ है कि यह समस्या अस्थाई नहीं बल्कि दीर्घकालिक है। ग्लेशियरों के इस तरह सिकुड़ने से नदियों के जलप्रवाह में अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव देखने को मिलेगा।
वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि इससे नदियों में गाद की मात्रा बढ़ेगी, जिससे पावर प्लांट की टरबाइनों में घिसाव और क्षति होगी। साथ ही, कम पानी वाले सीजन में बिजली उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है। हालांकि कभी-कभार होने वाली भारी बर्फबारी से थोड़े समय के लिए राहत मिलती है, लेकिन कुल मिलाकर स्थिति नाजुक बनी हुई है।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए रिपोर्ट में ग्लेशियरों और बर्फबारी की निगरानी के लिए मजबूत तंत्र स्थापित करने की सिफारिश की गई है। इसके अलावा, सटीक हाइड्रोलॉजिकल पूर्वानुमान प्रणाली विकसित करने और जलवायु-अनुकूल नीतियों को लागू करने पर जोर दिया गया है। हिमाचल प्रदेश के अधिकांश जलविद्युत प्रोजेक्ट ग्लेशियर से निकलने वाली नदियों पर ही निर्भर हैं, इसलिए इस प्राकृतिक संकट का समय रहते समाधान निकालना अनिवार्य हो गया है।

















