Kasol Garbage Issue: हिमाचल प्रदेश के प्रमुख पर्यटन स्थल कसोल से पर्यावरण सुरक्षा को लेकर एक बड़ा प्रशासनिक लापरवाही का मामला सामने आया है। कुल्लू प्रशासन ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के सामने दाखिल अपनी स्टेटस रिपोर्ट में औपचारिक तौर पर स्वीकार किया है कि कसोल में वन भूमि के एक हिस्से का इस्तेमाल म्युनिसिपल कचरे को जमा करने और उसे अलग-अलग (सेग्रिगेट) करने के लिए किया गया था।
प्रशासनिक रिपोर्ट के अनुसार, जिस जमीन पर यह कचरा जमा किया गया, वह पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील पार्वती घाटी (Eco Sensitive Forest) का हिस्सा है। वन विभाग द्वारा इस इको सेंसटिव फॉरेस्ट लैंड को एक अस्थायी उपाय के तौर पर चुना गया था।

दरअसल, मनाली के पास रंगरी में स्थित सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट ने जुलाई 2024 में इस प्रमुख टूरिस्ट डेस्टिनेशन से कचरा स्वीकार करना बंद कर दिया था। रंगरी प्लांट द्वारा अचानक कचरा लेने से इनकार करने के बाद उत्पन्न संकट से निपटने के लिए यह कदम उठाया गया था।
NGT के समक्ष दाखिल स्टेटस रिपोर्ट के अनुसार, वन क्षेत्र में कचरा डंप करने का निर्णय 11 जुलाई 2024 को मणिकरण के स्पेशल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (SADA) की बैठक में लिया गया था। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि रंगरी तक कचरा ले जाने में रुकावट आने के बाद वेस्ट-मैनेजमेंट कॉन्ट्रैक्टर ने कचरे को अलग-अलग करने के लिए कुछ समय के लिए वहां एकत्र किया था।
प्रशासन ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इस रुकावट के कारण कचरा उठाने वाली एजेंसी ने कई बार कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों का उल्लंघन किया। एजेंसी के खराब प्रदर्शन की वजह से ‘लक्ष्य टोटल सॉल्यूशंस’ के साथ कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर दिया गया। इसके बाद, अलग किए गए कचरे से बने ईंधन (RDF) को सोलन जिले के बाघा में स्थित एक सीमेंट फैक्ट्री में भेजा गया, जबकि सेग्रिगेशन के दौरान प्राप्त प्लास्टिक को कबाड़ डीलरों को बेच दिया गया।
कसोल में प्रस्तावित सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट और मटीरियल रिकवरी फैसिलिटी (MRF) के निर्माण के लिए लगभग 51 लाख रुपये जारी किए जा चुके हैं, लेकिन यह प्रोजेक्ट लगातार देरी के कारण अटका रहा। प्रशासन ने बार-बार अधिकारियों और कॉन्ट्रैक्टर को कसोल में प्रस्तावित फैसिलिटी का निर्माण तेज़ी से पूरा करने का निर्देश दिया और इसके लिए दो महीने की समय-सीमा भी तय की थी। इसके बावजूद काम आगे न बढ़ने पर आखिरकार निर्माण का टेंडर रद्द कर दिया गया और संबंधित कॉन्ट्रैक्टर को छह महीने के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया गया।
कचरा प्रबंधन की स्थिति सुधारने के लिए कुल्लू प्रशासन ने मणिकरण स्पेशल एरिया के लिए एक नई व्यवस्था शुरू की। अप्रैल 2026 में एक NGO, ग्रामीण विकास विभाग और SADA, मणिकरण के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता निष्पादित किया गया। इस समझौते के बाद NGO ने मई 2026 में कचरा उठाने और उसके प्रबंधन का काम संभाला।
नई व्यवस्था के तहत 13 जुलाई 2026 तक कुल 90.46 टन कचरा इकट्ठा किया गया, जिसमें से 20 टन गीले कचरे को कम्पोस्ट पिट के ज़रिए प्रोसेस किया गया, और 27.95 टन कचरे को MRF साइट से RDF सुविधाओं तथा रीसायकलर्स के पास भेजा गया। इसके अलावा क्षेत्र में ज़्यादा क्षमता वाली बेलिंग मशीन भी लगाई गई, जिसने जुलाई में कार्य करना शुरू कर दिया।
प्रशासन ने ट्रिब्यूनल को सूचित किया है कि अस्थायी डंपिंग साइट को अब पूरी तरह से साफ कर दिया गया है और वहां कोई कचरा शेष नहीं है। दरअसल यह पूरा मामला जून 2025 में तब प्रकाश में आया था जब NGT ने कसोल के जंगल में कचरा डंप किए जाने से जुड़ी खबरों और वायरल वीडियो पर स्वतः संज्ञान लिया था।
उन वीडियो में जंगल के भीतर प्लास्टिक और न सड़ने वाले कचरे के विशाल ढेर दिखाई दे रहे थे, जिसके बाद कुल्लू प्रशासन समेत संबंधित पक्षों को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया गया था। कसोल में पीक टूरिस्ट सीजन के दौरान हजारों की संख्या में पर्यटकों के आगमन से पार्वती घाटी के बुनियादी ढांचे पर कचरा प्रबंधन का अत्यधिक दबाव पड़ता है।


















