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India Pakistan Conflict: पाकिस्तान की सियासी चालबाजियों का काला सच, भारत से शांति की आड़ में हमेशा ही रची है बड़ी साजिशें..!

India Pakistan Conflict: पाकिस्तान की सियासी चालबाजियों का काला सच, भारत से शांति की आड़ में हमेशा ही रची है बड़ी साजिशें..!

India Pakistan Conflict:  भारत और पाकिस्तान के बीच हाल ही में हुए संघर्ष विराम का फैसला अब सवालों के घेरे में आ गया है। न्यूज एजेंसी एएनआई की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान की सेना ने संघर्ष विराम के बावजूद अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आया है। पाकिस्तान की सियासी चालबाजियों का काला सच यही है कि भारत के साथ शांति की आड़ में हमेशा ही बड़ी साजिशें रची है।

जानकारी मिली है कि पाकिस्तान की ओर से भारत की सीमा में ड्रोन भेजने और गोलीबारी की घटनाएं जारी हैं, जो संघर्ष विराम के समझौते की भावना के खिलाफ है। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि पाकिस्तान पर भरोसा करना कितनी बड़ी मूर्खता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की कुंडली में धोखा देने वाले ग्रह जन्म से ही सक्रिय हैं। चाहे वह 1947 का बंटवारा हो या फिर 1999 का कारगिल युद्ध, पाकिस्तान का इतिहास धोखे और विश्वासघात से भरा पड़ा है। इस बार भी, संघर्ष विराम के महज कुछ घंटों बाद ही उसकी असली मंशा सामने आ गई है।

पाकिस्तान के गठन के बाद से वहाँ के प्रमुख नेता और सैन्य अधिकारी भारत के प्रति बाहर से तो नज़दीकी दिखाते रहे, लेकिन उनके मन में भारत के प्रति हमेशा से नकारात्मक भावना और विष भरा रहा। पकिस्तान ने एक ओर शांति और कूटनीति की बात की, तो दूसरी ओर गुप्त रूप से युद्ध, घुसपैठ और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ जहर उगला गया।

भारत के प्रति बैर रखने का सिलसिला लियाकत अली खान (1947-1951) के कार्यकाल से ही यह सिलसिला शुरू हो गया था, जब 1947-48 में पाकिस्तान ने कश्मीर में कबायली हमलावरों की मदद से पहला भारत-पाक युद्ध छेड़ा।

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ख्वाजा नजीमुद्दीन (1951-1953) ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर को “अवैध कब्जा” कहा और भारत विरोध की नीति जारी रखी। इसके बाद मोहम्मद अली बोगरा (1953-1955) ने भले नेहरू से जनमत संग्रह की बात की, लेकिन अमेरिका से सैन्य गठजोड़ कर भारत की चिंताओं को बढ़ा दिया।

चौधरी मोहम्मद अली (1955-1956) भारत के खिलाफ नीतिगत रूप से खुद को इस्लामी गणराज्य घोषित किया । हुसैन शहीद सुहरावर्दी (1956-1957) नेहरू से बातचीत की पहल की गई, लेकिन सेना के बढ़ते प्रभाव और आंतरिक अस्थिरता के कारण उनका प्रयास खोखला साबित हुआ। शांति की बातें सिर्फ दिखावा थीं। इब्राहिम इस्माइल चुंदरीगर (1957) महज दो महीने के कार्यकाल में कोई बड़ी पहल नहीं हुई, लेकिन भारत-विरोधी माहौल और कश्मीर राग जारी रहा।

फिरोज खान नून (1957-1958) नेतृत्व में भी पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ नीतिगत रूप से खुद को इस्लामी गणराज्य घोषित किया और राष्ट्रमंडल से बाहर हो गया, एक और संकेत कि पाकिस्तान भारत के साथ दूरी बनाना चाहता था। साल 1958 के बाद, पाकिस्तान का असली चेहरा सैन्य शासकों जनरल अयूब खान और याह्या खान के दौर में सामने आया।

अयूब के (1958-1969) कार्यकाल में 1965 का युद्ध हुआ, जिसमें पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ के तहत कश्मीर में घुसपैठ की। याह्या खान (1969-1971) के शासन में 1971 का युद्ध हुआ,, क्योंकि याह्या खान ने पूर्वी पाकिस्तान में नरसंहार कराया। जिसमें भारत ने पाकिस्तान को हराया और बांग्लादेश स्वतंत्र हुआ। इसके बाद भारत को दोषी ठहराने की पाकिस्तान की आदत और गहरी हो गई।

जुल्फिकार अली भुट्टो ने 1972 में शिमला समझौते के जरिए शांति की पहल तो की, लेकिन जल्द ही ISI ने कश्मीर में भारत विरोधी गतिविधियां शुरू कर दीं, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि पाकिस्तान की नीयत में खोट अब भी बरकरार है। इस पूरे दौर में, सिंधु जल संधि और शिमला समझौता जैसे कुछ सकारात्मक प्रयास हुए, लेकिन पाकिस्तान की बार-बार की गई चालबाजियों, सैन्य गठबंधनों और आतंरिक विरोधाभासों ने भारत के साथ भरोसे के रिश्ते को कभी पनपने नहीं दिया।

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जुल्फिकार अली भुट्टो (1973–1977) ने 1971 में पाकिस्तान की शर्मनाक हार के बाद सत्ता संभाली। बांग्लादेश के गठन से तिलमिलाए पाकिस्तान ने इस हार का बदला लेने की नीयत पाल ली। भुट्टो के कार्यकाल में ISI ने भारत के खिलाफ गैर-राजकीय आतंकवादियों को समर्थन देना शुरू किया — यही वह बीज था, जिससे 1990 के दशक में कश्मीर में आतंकवाद का वृक्ष उगा।

जनरल जिया-उल-हक (1978–1988) ने सत्ता हथियाने के बाद आतंकवाद को सरकारी नीति का हिस्सा बना लिया। 1980 के दशक में “ऑपरेशन टोपक” के तहत पाकिस्तान की ISI ने कश्मीरी युवाओं को आतंक के लिए प्रशिक्षित करना शुरू किया, और लश्कर-ए-तैयबा, हिजबुल मुजाहिदीन जैसे संगठनों को बढ़ावा मिला

बेनजीर भुट्टो (1988–1990, 1993–1996) के दोनों कार्यकालों में कश्मीर में आतंक चरम पर पहुंच गया। 1989 में घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन हुआ। भले ही बेनजीर ने सार्वजनिक रूप से आतंक का समर्थन नहीं किया, लेकिन ISI की गतिविधियों पर उनका नियंत्रण नहीं था, और आतंकवादी घटनाएं जारी रहीं।

नवाज शरीफ (1990–1993, 1997–1999, 2013–2017) ने कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सेना और आतंकियों को LOC पार कर भारत में भेजा। भारत ने “ऑपरेशन विजय” के तहत उन्हें खदेड़ दिया। 26/11 मुंबई हमले (2008) के लिए पाकिस्तान आधारित लश्कर-ए-तैयबा को जिम्मेदार ठहराया गया। हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद को पाकिस्तान में खुला संरक्षण मिला। नवाज शरीफ ने 2018 में स्वीकार किया कि पाकिस्तान में आतंकी संगठनों को समर्थन मिलता है।

इमरान खान (2018–2022) के कार्यकाल में 14 फरवरी 2019 को पुलवामा में हुए आत्मघाती हमले में 40 सीआरपीएफ जवान शहीद हुए। इसके जवाब में भारत ने बालाकोट एयरस्ट्राइक में आतंकी शिविर तबाह कर दिए। इमरान ने तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्जे को “गुलामी से आज़ादी” बताया, जिससे पाकिस्तान के आतंक समर्थक चेहरे पर फिर से परदा हट गया।

शहबाज शरीफ (2022–वर्तमान) के कार्यकाल में 22 अप्रैल 2025 को कश्मीर में हुए आतंकी हमले में 26 लोग मारे गए, जिनमें अधिकतर पर्यटक थे। भारत ने इसे सीमा पार से आया आतंक बताया। पाकिस्तान ने इनकार किया, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय को हस्तक्षेप करना पड़ा। 10 मई 2025 को अमेरिका, की मध्यस्थता से युद्धविराम घोषित हुआ।

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लेकिन पाकिस्तान की सेना ने संघर्ष विराम के बावजूद अपनी नापाक हरकतें जारी रखीं, जिससे यह साफ होता है कि पाकिस्तान ने अपने गठन के बाद से ही भारत के साथ विश्वासघात की नीति अपनाई है। साथ ही, इसने धार्मिक कट्टरता को भी लगातार बढ़ावा दिया है। यही कारण है कि राजनीतिक विश्लेषकों और रणनीतिक जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान की ‘कुंडली’ में शुरुआत से ही छल, धोखा और अस्थिरता जैसे ‘ग्रह’ सक्रिय हैं, जो उसके व्यवहार और नीतियों में साफ झलकते हैं।

हालांकि सीज फायर तोड़ने के बाद भारत की ओर से इस मामले में अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन सुरक्षा एजेंसियां पूरी तरह से सतर्क हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, एनएसए अजित डोभाल और तीनों सेनाओं के प्रमुखों के साथ एक उच्च स्तरीय बैठक की, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। इस बैठक के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि भारत किसी भी स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह से तैयार है।

सवाल यह उठता है कि क्या संघर्ष विराम का फैसला सही था? क्या पाकिस्तान के साथ वार्ता और शांति के प्रयास बेकार हैं? या फिर यह एक बार फिर से भारत के सब्र की परीक्षा लेने का प्रयास है? इन सवालों के जवाब तलाशने की जरूरत है, क्योंकि देश की सुरक्षा और सम्मान से समझौता नहीं किया जा सकता।
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