Monsoon Session: संसद के आगामी मानसून सत्र को लेकर देश की राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। एक तरफ जहां देश के विभिन्न हिस्सों में मानसून की बारिश का दौर जारी है, वहीं दूसरी तरफ संसद सत्र के दौरान बैठकों के सफल होने की संभावनाओं पर आशंकाएं जताई जा रही हैं। सरकार और विपक्ष के अपने-अपने एजेंडे के कारण इस सत्र में भारी हंगामे के आसार हैं।
दरअसल, इस सत्र में नरेंद्र मोदी सरकार का मुख्य लक्ष्य परिसीमन विधेयक को पारित कराना है, जिसके बाद लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में सीटों की संख्या में 50 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है। सरकार इस कदम को संसद में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की दिशा में अनिवार्य बता रही है। चूंकि परिसीमन विधेयक केंद्र और राज्यों दोनों के विषयों को प्रभावित करेगा, इसलिए इसे पारित कराने के लिए संविधान में विशेष संशोधन की आवश्यकता होगी।

इस विशेष बदलाव के लिए सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सांसदों के दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होगी, साथ ही देश के आधे से अधिक राज्यों की विधानसभाओं से भी इस मंजूरी को हासिल करना होगा। इसी कानूनी पेच के बीच विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाला एनडीए विपक्षी दलों में तोड़फोड़ कर रहा है, ताकि लोकसभा में 360 सांसदों का मजबूत समर्थन जुटाया जा सके।
लोकसभा के जमीनी समीकरणों को देखें तो विशेष बहुमत हासिल करने के लिए एनडीए का आंकड़ा अभी जरूरी संख्या से 41 सीट दूर है। पिछले बजट सत्र में 131वें संविधान संशोधन के दौरान सरकार को लोकसभा में 298 वोट मिले थे, जबकि एनडीए की आधिकारिक संख्या 293 है। हालांकि, पिछले ढाई महीने के भीतर एनडीए ने 26 और सांसदों का प्रबंध कर लिया है।
इसमें तृणमूल कांग्रेस से अलग होकर नेशनल सिटीजन पार्टी ऑफ इंडिया में शामिल हुए 20 लोकसभा सांसद और शिवसेना (उद्धव गुट) से अलग होकर शिंदे गुट का हिस्सा बनने जा रहे 6 लोकसभा सांसद शामिल हैं। इन्हें मिलाकर एनडीए की संख्या 319 तक पहुंचती है। बाकी बचे बहुमत के लिए सरकार या तो समर्थन बढ़ाएगी या वोटिंग के दौरान सदन की कुल संख्या को घटाने की रणनीति अपनाएगी।
राज्यसभा में भी कमोबेश यही स्थिति बनी हुई है। आम आदमी पार्टी के 4 सांसदों के जाने के बाद वहां एनडीए की संख्या 152 हो गई है, जबकि दो-तिहाई बहुमत के लिए 163 का आंकड़ा आवश्यक है। हालांकि, समाजवादी पार्टी जैसी कुछ पार्टियां कई महत्वपूर्ण बिलों पर सरकार का समर्थन कर रही हैं, जिससे राज्यसभा में भी मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को अलग-थलग करने की तैयारी है।
इसके अतिरिक्त, एनडीए की उम्मीदें डीएमके के 22 सांसदों पर भी टिकी हैं। सीटों के निर्धारण को लेकर दक्षिण भारतीय राज्यों की अपनी चिंताएं हैं, क्योंकि 1976 में परिवार नियोजन को बढ़ावा देने के लिए 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों को 25 साल के लिए फ्रीज किया गया था, जिसे 2001 में वाजपेयी सरकार ने फिर 25 साल के लिए बढ़ा दिया था।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि सरकार आगामी बिल में यह स्पष्ट कर देती है कि राज्यों के बीच सीटों का आवंटन 1971 की जनगणना के आधार पर ही रहेगा और इस फ्रीज को अगले 25 साल के लिए और बढ़ाया जाएगा, तो डीएमके जैसी पार्टियां इस पर सहमत हो सकती हैं। ऐसी स्थिति में 2011 की जनगणना का उपयोग केवल राज्यों के भीतर के निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण के लिए किया जाएगा।
दूसरी ओर, विपक्ष इस सत्र में सरकार को कई मोर्चों पर घेरने की योजना बना रहा है। विपक्ष के एजेंडे में राम मंदिर में चंदा चोरी का मामला, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान शहीद हुए सैनिकों का विवाद, नीट पेपर लीक और सीबीएसई कॉपी चेकिंग विवाद में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की जवाबदेही जैसे बड़े मुद्दे शामिल हैं।
इनके अलावा, विपक्ष अंडमान निकोबार प्रोजेक्ट विवाद, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव की जमीन खरीद और राजस्थान में केंद्रीय राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी से जुड़े सब्सिडी मामले को भी सदन में उठाएगा। साथ ही, पेट्रोल में 20% एथेनॉल की मिक्सिंग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सरकार के पक्ष और बीपीसीएल के कार्यकारी निदेशक अनुराग सरागी के विरोधाभासी बयानों पर भी सवाल पूछे जाएंगे।
इसके जवाब में सरकार के फ्लोर मैनेजर संकट के समय पेट्रोलियम और खाद की आपूर्ति बनाए रखने की उपलब्धियों को सामने रखेंगे। साथ ही, सरकार मंत्रियों और सांसदों की अयोग्यता से जुड़े उस बिल को भी पास कराने की कोशिश करेगी, जिसके तहत 30 दिन या उससे अधिक समय तक जेल में रहने पर सदस्यता रद्द होने का प्रावधान शामिल है।
फिलहाल, इस सत्र में मोदी सरकार का सबसे बड़ा लक्ष्य परिसीमन विधेयक को पास कराना है। इसके लिए सरकार साम, दाम, दंड, भेद सब कुछ इस्तेमाल करने को तैयार है। बहुमत के लिए सरकार के पास दो ही रास्ते हैं, या तो सहयोगी दलों का समर्थन बढ़ाओ, या फिर वोटिंग के वक्त सदन में सदस्यों की संख्या कम करवा दो। फिलहाल इन दोनों ही फॉर्मूलों पर काम चल रहा है।
बीजेपी की राजनीति हमेशा से कांग्रेस को अकेले घेरने और उसे अलग-थलग करने की रही है। ऐसी स्थिति में कांग्रेस क्या कदम उठाएगी, यह देखने वाली बात होगी। जब नया बिल आएगा, तब कांग्रेस और बाकी विपक्षी दलों का स्टैंड क्या रहता है, इस पर सबकी नज़र होगी। फिलहाल विपक्ष को हर मुद्दे पर सोच-समझकर फैसला लेना होगा।


















