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मैं खफा तो हूँ पर गिला नहीं…

बड़े न होते तो सारे फसाद खड़े न होते!

तृप्ता भाटिया

“मैं खफा तो हूँ पर गिला नहीं…”
बहुत मुश्किल होता है इंसान बने रहना, जब आपके दिल के कोने से आह सी निकल रही हो पर आप यह समझ जायें की मेरा ही कर्म होगा पगले की तू जो आज दुखः है।
अपनी ही नज़रों में गिरे हैं उठ जाएंगे, किसी का बुरा कर के लोगों की नज़रों में तो नहीं गिरे।
वक्त बहुत कुछ सिखाता रहता है …उसमें से एक ये भी कि हर बात जाने दो मगर मन में मैल मत रखो……जरूरी नहीं जिससे हम प्रेम करे उससे प्रतिउत्तर में भी प्रेम मिले; जिन्हें हम वक्त दें वो भी वक्त दे;…..जिनके बारे में हम सोचें, वो भी हमारे बारे में सोचे।

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लेकिन अपना सर्कल पूरा करते रहना है जब तक मन कहे…… जब मन मना कर दे तो लौट जाना है।
कुछ लोग बिना बोले चले जाते हैं या अपनी भूमिका बदल लेते हैं…. हमारे अंदर का निष्कलुष हृदय खुद को ही दोष देने लगता है जबकि ऐसा नहीं है आपने प्रेम किया, वक्त दिया……अपनापन निभाया फिर आप क्यों दोषी? एक वक्त के बाद जाने दीजिए लोगों को…..वक्त को, घटनाओं को…..सब एक क्षण है और सबको गुज़र जाना है।

इनदिनों ज़िंदगी रह रह कर याद दिलाती है कि कौन-कौन पास थे और कौन-कौन पास रह गए हैं। हम बहुत कम लोगों को रिटेन कर पाते हैं या कहिए कि बहुत कम लोग रिटेन रह पाते हैं…..आज जिससे घनिष्ठता है इतनी कि दुनिया कह उठे कि हाय! दो जिस्म एक जान है……उनमें से भी एक को जाना होगा।
मनुष्य के मनुष्य होने पर यकीन रखना चाहिए हमें……शिकायत नहीं होनी चाहिए किसी से। वक्त के बीत जाने या बदल जाने की शिकायत क्यों और किससे भला!

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