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लाहुली कोकिला ‘रोजी’ ने लोक गायिकी में स्थापित किया है एक अलग मुकाम

लाहुली कोकिला ‘रोजी’ ने लोक गायिकी में स्थापित किया है एक अलग मुकाम

लाहौल स्पीति|
लाहुली कोकिला ‘रोजी’ ने लोक गायिकी में स्थापित किया है एक अलग मुकाम
कुल्लू 19 अपै्रल। जनजातीय जिला लाहौल-स्पिति के छोटे से गांव में पली-पढ़ी रोजी शर्मा अपनी लोक गायिकी के कारण ‘लाहुली कोकिला’ के नाम से भी जानी जाती है। सुरीली आवाज की मालिक रोजी ने लोक गायिकी में अपना एक अलग मुकाम स्थापित किया है। लाहौल घाटी को कोई भी मेला व त्यौहार रोजी की गायिकी के बगैर अधूरा रहता है। हसमुख और खुशमिजाज रोजी लोगों के दिलों पर भी राज करती हैै। विवाह शादी हो या अन्य समारोह जनजातीय लोग रोजी को गाने के लिये बुलाना नहीं भुलते।

रोजी हिमाचल प्रदेश के विभिन्नि जिलों में आयोजित होने वाले राज्य, राष्ट्रीय अथवा अंतरराष्ट्रीय स्तर के उत्सवों में अनेक मंचों पर धमाल मचा चुकी है। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा की संध्याओं में रोजी एक ऐसा नाम है जो लाहौली जनपद की डिमाण्ड पर गाने गाकर पुरे पाण्डाल को झूमने पर मजबूर कर देती है। लाहौल घाटी के लोगों ने अपनी परम्पराओं को आज भी सहज कर रखा है। विवाह शादी के मौके पर रात भर तीन दिनों तक महिला व पुरूष सामुहिक रूप से नृत्य करते हैं। इन अवसरों पर रोजी की उपस्थिति चार चांद लगा देती है।

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रोजी बताती है कि बाल्यकाल में वह अपनी दादी के साथ लाहुली गीत गुनगुनाती रहती थी और धीरे-धीरे जब स्कूल में गाने का मौका मिलता तो वह बिना किसी संकोच के खड़ी होकर गाना शुरू कर देती थी। वहीं से गायिकी का शौक पैदा हुआ। 10वीं कक्षा के बाद अनेक बार स्कूल स्तर पर गाने का मौका मिला। कॉलेज में युवा उत्सवों में गाने गाए।

रोजी की अनेक डीबीडी बाजार में आई और कुल्लू व लाहौल में घर-घर में सुनी जा सकती हैं। इनमें हालड़ा, छुलणी तथा जुलचमरिंग यानि चांद की ओर चले काफी मशहूर हुई। रोजी ने कुल्लू में जौणी तथा संदीप ठाकुर के स्टुडियो में सभी गाने रिकार्ड किये हैं। इनके गानों में कुछ बहुत ही लोकप्रिय हुए हैं जिनमें ‘आमा जुले, हाथा रूमाला प्यारी निशानी, जिसपे अंगमों एकी रंगा सूटा हो, भाई साहब जी केलांग सेला प्रमुख हैं। वह कुल्लवी, मण्डयाली, चम्बयाली गाने भी बखूबी गा लेती है। रोजी के गानों पर दर्शक बिना झूमे नहीं रह पाते।

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रोजी बताती है कि आज युवा तीसरी पीढ़ी के गानों को ज्यादा पसंद करते हैं जिनके संगीत में काफी हो-हल्ला रहता है। वह बहुत पुराने गीतों को सीखने के लिय सदैव उत्सुक रहती है और लाहौल के पुराने गाने रोजी ने संजोकर रखे भी हैं। वह बताती है कि पुरानी गीतों का एक अलग अंदाज है जिनमें धीमा स्वर व मधुर संगीत रहता है और गीत किसी सच्ची घटना पर आधारित होते हैं।

पुराने लोक गीतों में बोल का स्वरूप भी थोड़ा कठिन रहता है और नई पीढ़ी के बच्चे कई शब्दों को नहीं समझ पाते, लेकिन गीत सुनकर सभी को एक आनंद की अनुभूति जरूर होती है। वह पुराने गीतों को गाना ज्यादा पसंद करती है जिनमें रामायण व महाभारत काल का वर्णन आता हो। रोजी का मानना है कि बेहतर स्टार कलाकार बनने के लिये पूर्णकालिक अभ्यास जरूरी है, लेकिन एवज में कलाकारों को उचित पारिश्रमिक मिलना चाहिए।

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