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तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा 88 वर्ष के हुए, शऱण देने के लिए भारत को चुकानी पड़ी थी बड़ी कीमत

Published on: 6 July 2023
बोद्ध धर्मगुरु दलाई लामा

प्रजासत्ता|
तिब्बत के आध्यात्मिक धर्मगुरु और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता दलाईलामा गुरुवार को मैकलोडगंज में 88वां जन्मदिन मना रहे हैं। उन्हें 61 साल पहले 1959 तिब्बत से भागना पड़ा था। तब से वो भारत में रह रहे हैं। पूर्वोत्तर तिब्बत के एक किसान परिवार में 6 जुलाई 1935 को दलाई लामा तेनज़िन ग्यात्सो का जन्‍म हुआ था। बता दें कि कई आध्‍यात्मिक संकेतों का पालन करने और 13वें दलाई लामा के उत्‍तराधिकारी की खोज के दौरान 2 साल की उम्र में ल्‍हामो थोंडुप स्थित धार्मिक अधिकारियों ने दलाई लामा तेनज़िन ग्यात्सो की पहचान की। इस तरह से उन्हें 14वां दलाई लामा घोषित किया गया।

हालांकि साल 1959 में चीनी शासन के खिलाफ एक असफल तिब्बती विद्रोह करने के बाद वह सैनिक की वेशभूषा में भारत भाग आए। तब से लेकर आजतक वह हिमाचल प्रदेश की धर्मशाला में रह निवास कर रहे हैं। भारत देश में रहकर वह तिब्‍बत की संप्रभुता के लिए अहिंसात्‍मक संघर्ष कर रहे हैं। आइए जानते हैं उनके जन्मदिन के मौके पर दलाई लामा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में…

साल 1959 में लदाई लामा तिब्बत की राजधानी ल्हासा से पैदल ही भारत के लिए निकल पड़े थे। इस दौरान हिमालय के पहाड़ों को पार करते हुए वह महज 15 दिनों के अंदर भारत की सीमा में आ गए थे। प्राप्त जानकारी के अनुसार, वह 31 मार्च 1959 को भारतीय़ सीमा में दाखिल हुए थे। यात्रा के दौरान उनकी और उनके सहयोगियों की कोई ख़बर नही आने पर कई लोग ये आशंका जताने लगे थे कि उनकी मौत हो गई होगी।

दलाई लामा के साथ कुछ सैनिक और कैबिनेट के मंत्री थे। चीन की नज़रों से बचने के लिए ये लोग सिर्फ रात को सफ़र करते थे। हिमालय के पहाड़ों को पार करते हुए 15 दिनों बाद भारतीय सीमा में दाखिल हुए थे। जिसके बाद वह हमेशा के लिए भारत के हो गए। इस यात्रा के दौरान उन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था। क्योंकि चीन की नजरों से बचने के लिए वह सिर्फ रात में ही सफर करते थे।

दलाई लामा और उनकी सरकार साल 1962 में भारत आ गई थी। जिसके कारण भारत को चीन की नाराजगी का सामना करना पड़ा था। दरअसल, चीन ने दलाई लामा के भारत आ जाने की घटना को युद्ध के रूप में शुरू करने के बहाने के रूप में इस्तेमाल किया। हालांकि साल 1959 में हुए तिब्बती विद्रोह में भारत शामिल नहीं था। लेकिन इसके बाद भी चीन ने इस विद्रोह के लिए भारत को दोषी ठहराया।

चीन ने भारत पर आरोप लगाते हुए कहा कि दलाई लामा तिब्बती क्षेत्र से भगाने की योजना में भारत शामिल था। उनकी तरफ से दावा किया गया कि चीन विरोधी प्रचार और सीमा पर आक्रामकता में नई दिल्ली शामिल थी। दलाई लामा द्वारा भारत आना और यहां पर शरण लेने का चीन ने कड़ा विरोध जताया था। इस बात का बदला लेने के लिए चीन ने 20 अक्टूबर 1962 को भारत पर हमला कर दिया था।

समय बिता लेकिन चीन को भारत में दलाई लामा को शरण मिलना अच्छा नहीं लगा। दलाई लामा और चीन के कम्युनिस्ट शासन के बीच तनाव बढ़ता गया। दलाई लामा को दुनिया भर से सहानुभूति मिली लेकिन अब तक वह निर्वासन की ही ज़िंदगी जी रहे हैं। जिस देश में भी दलाई लामा जाते हैं वहां की सरकारों से चीन आधिकारिक तौर पर आपत्ति जताता है। चीन दलाई लामा को अलगाववादी मानता है. वह सोचता है कि दलाई लामा उसके लिए समस्या हैं।

वर्तमान में हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में रहते हुए दलाई लामा तिब्बत की निर्वासित सरकार को चलाते है। जिसका चुनाव भी होता है और इस चुनाव में दुनियाभर के तिब्बती शरणार्थी मतदान करते हैं। हालांकि मतदान करने से पहले शरणार्थी तिब्बतियों को रजिस्ट्रेशन करवाना होता है। चुनाव के दौरान तिब्बती लोग अपने सिकयोंग यानी राष्ट्रपति को चुनते हैं। अपने देश की तरह ही तिब्बत की संसद का कार्यकाल भी 5 साल का होता है। इस दौरान चुनाव लड़ने और मतदान करने का अधिकार सिर्फ उन तिब्बतियों के पास होता है। जिनके पास ग्रीन बुक होती है। सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन द्वारा यह बुक जारी की जाती है। एक तरह से इसे पहचान पत्र भी कहा जा सकता है।

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