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Premanand Maharaj: ब्रज की माटी में जन्म, लेकिन सेवा बाहर – देवी चित्रलेखा का सवाल और महाराज पेमानंद जी का दिल छूने वाला जवाब

Premanand Maharaj: ब्रज की माटी में जन्म, लेकिन सेवा बाहर - देवी चित्रलेखा का सवाल और महाराज पेमानंद जी का दिल छूने वाला जवाब

Premanand Maharaj: वृन्दावन के महान संत महाराज प्रेमानंद जी का जीवन और उनके उपदेश विशेष रूप से भक्ति, प्रेम और सेवा के सिद्धांतों पर आधारित होते हैं। उनका व्यक्तित्व और शिक्षाएं न केवल उनकी सन्निकटता में रहने वाले भक्तों के लिए बल्कि सम्पूर्ण समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गईं। वह असंख्य भक्तों के प्रिय गुरु बन गए हैं, क्योंकि उन्होंने न केवल जीवन के आंतरिक सुख का मार्ग बताया, बल्कि उन्हें भगवान और भक्ति के गहरे रहस्यों से भी अवगत कराया है।

हाल ही में आध्यात्मिक प्रवक्ता और कथावाचक देवी चित्रलेखा, संत प्रेमानंद जी के दर्शन के लिए उनके आश्रम पहुंची थी। इस दौरान देवी चित्रलेखा ने हाथ जोड़कर महाराज पेमानंद जी महाराज से पूछा, “महाराज, ब्रज में जन्म हुआ, ठाकुर जी की सेवा करते हैं, नाम जपते हैं, लेकिन ब्रजवास नहीं हो पाते। बाहर घूमते रहते हैं। मन में कभी-कभी लगता है कि धाम में रहकर सेवा करनी चाहिए थी। क्या गलत है?”

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महाराज जी ने प्यार से समझाया, “देखो, अगर तुम बृजेंद्र नंदन श्री कृष्ण की शरण में हो, राधा रानी के चरणों का चिंतन करती हो, तो तुम जहां भी हो – वही ब्रज है। बाहर जाकर सोए हुए लोगों को जगाना, उन्हें वृंदावन लाना, रास दिखाना, भागवत सुनाना – ये क्या कम सेवा है?”उन्होंने उदाहरण दिया, “संत, वैष्णव, रासाचार्य, भागवत कथाकार – अगर ये बाहर ना जाएं, तो कौन आएगा वृंदावन? बहुत से लोग तो रास देखकर ही ललचाए, प्रिया-प्रीतम की आसक्ति जगी। तुम बाहर जाकर रास कराती हो, भागवत सुनाती हो – ये ब्रज की सबसे बड़ी सेवा है।”

धामवासी नहीं, धाम उपासी भी वही गति पाते हैं
महाराज जी ने गहरी बात कही, “तुम धाम में नहीं रह पाईं, लेकिन धाम की उपासना कर रही हो। धाम उपासी और धाम वासी – दोनों की गति एक ही है। जैसे भारतीय जवान कहीं भी शहीद हो, तिरंगे में लपेटकर भारत आता है – वैसे ही धाम का भक्त कहीं भी शरीर छोड़े, धाम ही पहुंचेगा।”उन्होंने हौसला दिया, “अमेरिका में रहो, तो भी वृंदावन आओगे। बस दृढ़ विश्वास रखो। तुम भगवान के पार्षद हो। जहां भी शरीर छूटे, धाम से बिलग नहीं होंगे।”

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महाराज जी ने देवी जी के काम की तारीफ की। कहा, “तुमने गौ माता का अस्पताल खोला ना? बहुत सुंदर! जहां बीमार, लाचार गायों का इलाज हो, दर्द मिटे – यही धन की सार्थकता है। धन कमाओ, लेकिन खर्च कहां करो? अपना पेट भरने में नहीं, परोपकार में। जितना बच सको, गौ सेवा, नाम जप, भगवान का यश गाओ – यही जीवन का असली मुनाफा है।” उन्होंने कहा कि , “भगवान कहते हैं – पर हित सरिस धर्म नहीं भाई। दूसरों का भला करने से बड़ा कोई धर्म नहीं। जटायु जी ने सीता मां की रक्षा की, भगवान ने कहा, ‘मेरी कृपा से नहीं, तुम्हारी करनी से तुम्हें परम पद मिल रहा है।’ वही बात है – गौ सेवा, जीव सेवा, ये भगवान को सबसे प्रिय है।”

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कम खर्चा खुद पर, ज्यादा परमार्थ पर
अंत में सलाह दी, “जो कमाई हो, परिवार चलाओ, समाज का पेट भराओ। खुद पर कम खर्चा करो, परमार्थ पर ज्यादा। पश्चाताप मत करो। उत्साह से भगवान का गुणगान करो। नाम जपो। सेवा करो। यही जीवन का असली स्वाद है।”

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