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Khair Farming युवाओं के लिए हरा-भरा Business Ideas, लाखों की कमाई का मौका

Green Business Ideas: खैर की खेती अब युवाओं के लिए एक आकर्षक बिजनेस बन रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती मांग के कारण यह एग्रोफॉरेस्ट्री का सबसे लाभदायक विकल्प है। 7-8 साल में ही कटाई शुरू हो जाती है और एक 10 साल पुराना पेड़ कम से कम 20,000 रुपये
Khair Farming युवाओं के लिए हरा-भरा Business Ideas, लाखों की कमाई का मौका
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Khair Farming Business Ideas: देश के युवाओं के लिए खैर की खेती एक नया और लाभदायक बिजनेस आइडिया बनकर उभर रही है। सामाजिक नेता और प्रभावशाली लोग युवाओं को प्रोत्साहित कर रहे हैं कि वे इस पारंपरिक पेड़ की खेती करके आर्थिक आत्मनिर्भरता हासिल करें। खैर की खेती अब युवाओं के लिए एक आकर्षक बिजनेस है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती मांग के कारण यह एग्रोफॉरेस्ट्री का सबसे लाभदायक विकल्प है।

उल्लेखनीय है कि खैर की मांग कभी कम नहीं होती क्योंकि यह पान में इस्तेमाल होने वाले कत्था, आयुर्वेदिक दवाओं, चमड़े की टैनिंग और कपड़ा रंगाई में काम आता है। इसके घने और मजबूत लकड़ी से चारकोल, फर्नीचर और औजार भी बनते हैं। यह पौधा 7-8 साल में ही कटाई योग्य हो जाता है और एक 10 साल पुराना पेड़ कम से कम 20,000 रुपये का मुनाफा देता है। पथरीली,रेतीली और बंजर जमीनों पर 250 पौधे प्रति बीघा लगाकर अच्छी कमाई संभव है।

एग्रोफॉरेस्ट्री विशेषज्ञ मानते हैं कि खैर के उत्पादों की मांग हमेशा बनी रहती है क्योंकि ये पारंपरिक आदतों और उद्योगों से जुड़े हैं। खैर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह तेजी से बढ़ता है और जल्दी मुनाफा देता है। किसान 7-8 साल में ही कटाई शुरू कर सकते हैं। एक 10 साल पुराना पेड़ कम से कम 20,000 रुपये का रिटर्न दे सकता है। कच्चे कत्था का बाजार मूल्य 60 से 70 रुपये प्रति किलोग्राम है। छोटे किसान भी बंजर या रेतीली जमीन पर 250 पौधे प्रति बीघा लगाकर अच्छा लाभ कमा सकते हैं।Khair Farming युवाओं के लिए हरा-भरा Business Ideas, लाखों की कमाई का मौका

एग्रोफॉरेस्ट्री से जुड़े उद्यमी इसे “हरा फिक्स्ड डिपॉजिट” कहते हैं जो हर साल मूल्य बढ़ाता है। हिमाचल, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश व असम के पहाड़ी इलाकों में बड़े पैमाने पर खैर की खेती हो रही है। यहां सैकड़ों बीघा जमीन पर पौधे लगाए गए हैं और कई जगह तो प्रोसेसिंग फैक्ट्री भी स्थापित हैं जो किसानों से सीधे खरीद सुनिश्चित करती हैं। एक रिपोर्ट के मुताबक इस मॉडल ने असम के ऊपरी जिलों जैसे सदिया और तिनसुकिया के किसानों को प्रेरित किया है।

एग्रोफॉरेस्ट्री के जानकार कहते हैं कि अरुणाचल,और असम में खैर ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था बदल दी है। विशेषज्ञों के अनुसार असम की बहुत सी जमीन खैर की खेती के लिए आदर्श है। ऊपरी असम के दिब्रूगढ़, शिवसागर और तिनसुकिया के नदी किनारे की रेतीली जलोढ़ मिट्टी, मध्य असम के नागांव और मोरिगांव की दोमट मिट्टी और फुटहिल जिलों उदालगुड़ी व सोनितपुर की सूखी अच्छी जल निकासी वाली जमीन पर यह पेड़ अच्छा उगता है। बराक वैली के कुछ ऊंचे हिस्सों में भी यह फलता-फूलता है।

एग्रोफॉरेस्ट्री के जानकार बताते हैं कि बंजर जमीनों को उपयोगी बनाने के लिए खैर सबसे अच्छे विकल्पों में से एक है। ऐसे में युवा समूह अब सहकारी समितियां बना कर खैर की नर्सरी लगाएं, पौधे तैयार करें और प्रोसेसिंग यूनिट से सीधे जुड़कर बिचौलियों से बचें। वे कहते हैं कि यह सिर्फ खेती नहीं, बल्कि हरा बिजनेस मॉडल है जो आय के साथ पर्यावरण संरक्षण और कार्बन कैप्चर में भी मदद करता है।

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वहीँ कई अर्थशास्त्री और विशेषज्ञ मानते हैं कि इसे सरकारी एग्रोफॉरेस्ट्री, स्किल डेवलपमेंट और ग्रीन एंटरप्रेन्योरशिप योजनाओं से जोड़ा जा सकता है। क्योंकि यह युवाओं के लिए परंपरा, बिजनेस और स्थिरता को जोड़ने का सुनहरा मौका है। अगर इसे बड़े स्तर पर लागू किया जाए तो हजारों परिवारों को टिकाऊ रोजगार मिल सकता है और राज्य की बंजर जमीनें फिर से हरी-भरी हो सकती हैं। हिमाचल सरकार सही देश के अन्य राज्यों को भी इस बिजनेस आईडिया को अपनाना चाहिए।

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