Himachal News: हिमाचल प्रदेश की सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार ने राज्य के गहरे आर्थिक संकट के बीच एक अत्यंत कड़ा और प्रशासनिक रूप से महत्वपूर्ण कदम उठाने की तैयारी कर ली है। प्रदेश सरकार अब राज्य में अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों की संख्या में कटौती करने पर गंभीरता से विचार कर रही है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने प्रशासनिक ढांचे को छोटा और चुस्त-दुरुस्त बनाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार को कैडर घटाने का प्रस्ताव भेजने की पहल की है। मुख्यमंत्री के इस साहसिक निर्णय का प्रदेश के तकनीकी शिक्षा मंत्री राजेश धर्माणी ने भी पुरजोर समर्थन किया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, सुक्खू सरकार ने केंद्र सरकार को भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारियों की स्वीकृत संख्या को 153 से घटाकर 147 करने का औपचारिक प्रस्ताव भेजा है। केवल प्रशासनिक पदों पर ही नहीं, बल्कि भारतीय वन सेवा (IFS) के कैडर पर भी कैंची चलने वाली है। आईएफएस अधिकारियों के स्वीकृत पदों को 114 से घटाकर 83 करने का प्रस्ताव फिलहाल अपने अंतिम चरण में बताया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, सरकार भविष्य में भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारियों के कैडर की भी गहन समीक्षा करने जा रही है ताकि इसे तर्कसंगत बनाया जा सके।
कैबिनेट मंत्री राजेश धर्माणी ने इस निर्णय की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि अधिकारियों के पदों के अनावश्यक विस्तार से प्रदेश की तिजोरी पर भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब इस संबंध में अधिकारियों से चर्चा की गई, तो उन्होंने इसे ‘प्रमोशनल एडमिंस’ की प्रक्रिया बताया। धर्माणी के अनुसार, इसी वजह से प्रशासनिक विस्तार इतना अधिक बढ़ गया है कि उसे वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों में संभालना सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।
मंत्री धर्माणी ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ का नारा तो देते हैं, लेकिन धरातल पर इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री सुक्खू द्वारा कैडर में कमी के लिए की गई पहल को एक ‘साहसिक कदम’ करार दिया। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार ने भी अतीत में इस तरह की पहल की थी, लेकिन वे इसे उस स्तर तक नहीं ले जा पाए थे जिस स्तर पर वर्तमान सरकार ले जा रही है।
सरकार का मानना है कि यह एक सुधारात्मक कदम है जो राज्य की चरमराती अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में सहायक सिद्ध होगा। राजेश धर्माणी ने तर्क दिया कि उच्च पदों पर कटौती करने से जो संसाधन बचेंगे, उनका उपयोग उन श्रेणियों की नियुक्तियों के लिए किया जाएगा जिनकी वर्तमान समय में प्रदेश को सर्वाधिक आवश्यकता है। इससे न केवल सरकारी खर्च में कमी आएगी, बल्कि विकास कार्यों के लिए बजट की उपलब्धता भी सुनिश्चित होगी।
उधर, प्रशासनिक मामलों के जानकारों का मानना है कि यदि केंद्र सरकार इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेती है, तो हिमाचल प्रदेश में आला अधिकारियों की तैनाती और पदोन्नति की व्यवस्था में बड़ा बदलाव आएगा। आईपीएस कैडर की आगामी समीक्षा भी इसी कड़ी का हिस्सा मानी जा रही है, जिससे स्पष्ट है कि सरकार उच्च स्तर पर होने वाले खर्चों को कम कर निचले स्तर पर कार्यक्षमता बढ़ाना चाहती है। प्रदेश सरकार का लक्ष्य है कि प्रशासन को छोटा रखा जाए ताकि निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज हो और जनता के प्रति जवाबदेही बढ़े।
उल्लेखनीय है कि वर्तमान में हिमाचल प्रदेश जिस कर्ज और आर्थिक दबाव से गुजर रहा है, उसे देखते हुए मुख्यमंत्री सुक्खू का यह कदम एक बड़े रिफॉर्म के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, कैडर में कटौती से भविष्य में अधिकारियों की पदोन्नति और राज्य में प्रशासनिक नियंत्रण पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा। फिलहाल, सरकार का पूरा ध्यान इस प्रस्ताव को केंद्र से मंजूरी दिलाने और राज्य के विकास को गति देने पर केंद्रित है।
















