Prajasatta Side Scroll Menu
Bahra University - Shimla Hills

राहुल गांधी के भारी विरोध के बीच मोदी सरकार ने ₹13,000 करोड़ के इस सीक्रेट एयरपोर्ट पर लगा दी मुहर!

Andaman and Nicobar Airport Project: केंद्र सरकार ने ग्रेट निकोबार में 13,000 करोड़ रुपये की लागत से एक नए सिविल-मिलिट्री हवाई अड्डे के निर्माण को मंजूरी दे दी है, जिसे लेकर देश के राजनीतिक गलियारों में भारी विवाद छिड़ गया है।
Great Nicobar Airport

Great Nicobar Airport: केंद्र सरकार ने पूर्वी हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्थिति को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने ग्रेट निकोबार में 13,000 करोड़ रुपये की लागत से एक नए ग्रीनफील्ड सिविल-मिलिट्री एयरपोर्ट के निर्माण को अपनी मंजूरी दे दी है। यह नया प्रोजेक्ट पर्यावरण के लिहाज से बेहद संवेदनशील द्वीप पर प्रस्तावित 81,000 करोड़ रुपये के व्यापक ‘ग्रेट निकोबार आइलैंड डेवलपमेंट प्रोजेक्ट’ का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

इस मेगा प्रोजेक्ट को लेकर इस समय देश में एक बड़ी राजनीतिक लड़ाई छिड़ गई है। इंडिया टुडे ने आधिकारिक सरकारी और रक्षा सूत्रों के हवाले से इस बात की पुष्टि की है कि यह प्रस्तावित डुअल-यूज़ एयरपोर्ट गलाथिया बे के पास चिंगेन नामक स्थान पर बनाया जाएगा। इस हवाई अड्डे की खास बात यह होगी कि यह आम नागरिकों के साथ-साथ भारतीय सेना, दोनों की एविएशन और परिचालन संबंधी जरूरतों को एक साथ पूरा करेगा।

रणनीतिक रूप से यह बेहद खास है क्योंकि यह दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक, यानी मलक्का जलडमरूमध्य शिपिंग रूट के बिल्कुल नजदीक स्थित है। इस नए फैसले के साथ ही कैंपबेल बे में स्थित भारतीय नौसेना के मौजूदा एयर स्टेशन ‘INS बाज’ पर रनवे को बढ़ाने की लंबे समय से चल रही योजनाओं को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।

सरकारी सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, विभिन्न तकनीकी अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि INS बाज के मौजूदा 4,500 फीट लंबे रनवे को बढ़ाकर 10,000 फीट करना बेहद मुश्किल काम था। इसके पीछे जमीन की बनावट से जुड़ी भौगोलिक सीमाएं, नेविगेशन की गंभीर चुनौतियां और बहुत बड़े पैमाने पर आवश्यक सपोर्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी जैसी मुख्य दिक्कतें आड़े आ रही थीं।

इसे भी पढ़ें:  अमित शाह ने लॉन्च किया बीजेपी का चुनाव प्रचार गीत, जनसभा में बोले- कांग्रेस का काम लोगों के बीच झगड़ा करवाना

अधिकारियों ने इस बात को भी खुलकर स्वीकार किया है कि पुराने रनवे का विस्तार करने से स्थानीय आदिवासी बस्तियों, घने जंगलों और वहां के वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों पर पर्यावरण की दृष्टि से कहीं अधिक प्रतिकूल असर पड़ सकता था। इसकी तुलना में प्रस्तावित ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट का चयन अधिक व्यावहारिक और कम नुकसानदेह माना गया है।

रक्षा क्षेत्र के अधिकारियों का कहना है कि यह नई ग्रीनफील्ड साइट भविष्य में और अधिक विस्तार के लिए पर्याप्त जगह उपलब्ध कराती है। इसके अलावा, यह रणनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में भारत की सैन्य पहुंच, हवाई निगरानी क्षमताओं और सेना की लॉजिस्टिक्स मौजूदगी को कई गुना मजबूत करने वाली साबित होगी।

सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, यह नया सिविल-मिलिट्री एयरपोर्ट आगामी पांच साल की अवधि में पूरी तरह बनकर तैयार हो जाएगा। हालांकि यह पूरी तरह से भारतीय नौसेना के ऑपरेशनल कंट्रोल के अधीन रहेगा, लेकिन इसके साथ ही यह आम लोगों की हवाई यात्रा की जरूरतों को भी सुचारू रूप से पूरा करेगा। यह पूरा प्रोजेक्ट उस बड़े मास्टर प्लान का हिस्सा है जिसमें एक अत्याधुनिक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, बिजली से जुड़े बुनियादी ढांचे का निर्माण और एक नई आधुनिक टाउनशिप का विकास शामिल है। सरकार का अंतिम उद्देश्य इस पूरे द्वीप को एक विशाल अंतरराष्ट्रीय आर्थिक और रणनीतिक केंद्र के रूप में तब्दील करना है।

इसे भी पढ़ें:  Supreme Court on Post of Deputy CM: राज्यों में उपमुख्यमंत्री की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट ने दिया बड़ा बयान

एयरपोर्ट को लेकर यह बड़ी घोषणा ऐसे समय में सामने आई है जब विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस पूरे प्रोजेक्ट पर तीखा हमला बोला है। राहुल गांधी ने हाल ही में इन द्वीपों का व्यक्तिगत दौरा किया था और वहां की प्रसिद्ध कोरल रीफ के पास स्कूबा-डाइविंग भी की थी। द्वीप से लौटने के बाद उन्होंने ‘ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट’ को देश के सबसे बड़े घोटालों में से एक करार दिया है। उन्होंने इसे देश की अमूल्य प्राकृतिक और आदिवासी विरासत के खिलाफ सबसे गंभीर अपराधों में से एक बताते हुए सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं।

विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अपने आरोपों में कहा है कि इस विकास कार्य के चलते द्वीप पर मौजूद विशाल और प्राचीन वर्षावन पूरी तरह नष्ट हो जाएंगे। उन्होंने दावा किया कि इस निर्माण के लिए 1.5 करोड़ से अधिक पेड़ों को काट दिया जाएगा, जिससे वहां की नाजुक कोरल रीफ को भारी नुकसान पहुंचेगा। इसके साथ ही, उन्होंने चिंता जताई कि इस प्रोजेक्ट के कारण वहां की बेहद कमजोर और विलुप्तप्राय ‘शोम्पेन जनजाति’ समेत अन्य मूल निवासियों को अपनी पैतृक जमीन से विस्थापित होने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

इसे भी पढ़ें:  अब 250 रुपये में 15 मिनट में घर पर ही करवाएं कोविड टेस्ट

मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने भी हाल के हफ्तों में इस प्रोजेक्ट के खिलाफ अपने विरोध प्रदर्शनों को काफी तेज कर दिया है। पार्टी ने इस गंभीर विषय पर संसद में विस्तृत और खुली बहस कराने की मांग उठाई है। कांग्रेस ने इस पूरे प्रोजेक्ट को दी गई पर्यावरण संबंधी मंजूरियों, इसकी वास्तविक आर्थिक व्यवहार्यता, सरकारी पारदर्शिता और स्थानीय आदिवासियों के अधिकारों पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को लेकर कई तीखे सवाल दागे हैं।

विपक्ष का सीधा आरोप है कि सरकार इस मामले में पर्यावरणविदों, मानव-विज्ञानियों और स्थानीय समुदायों द्वारा उठाई गई जायज चिंताओं को पूरी तरह दूर करने में पूरी तरह नाकाम साबित हुई है। दूसरी तरफ, केंद्र सरकार ने लगातार विपक्ष के इन सभी आरोपों और चिंताओं को खारिज करते हुए इस बड़े प्रोजेक्ट का मजबूती से बचाव किया है।

सरकार का स्पष्ट तर्क है कि यह 13,000 करोड़ रुपये का निवेश देश की सुरक्षा के लिए एक बेहद अनिवार्य और अहम रणनीतिक निवेश है। सरकार के अनुसार, इस कदम से न केवल पूरे इंडो-पैसिफिक (हिंद-प्रशांत) क्षेत्र में भारत की सैन्य और भू-राजनीतिक मौजूदगी काफी मजबूत होगी, बल्कि देश के सबसे दूर-दराज और अलग-थलग पड़े इलाकों में से एक तक आम नागरिकों की कनेक्टिविटी भी पहले से कहीं बेहतर हो जाएगी।

Kasauli International Public School, Sanwara (Shimla Hills)
Great Nicobar Indian Navy Indian Politics Infrastructure India Modi Government Strategic Infrastructure

Join WhatsApp

Join Now