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बहुपति प्रथा पर Himachal High Court का बड़ा फैसला: ‘जब तक सभी भाईयों की मौत न हो जाए, अगली पीढ़ी को नहीं मिलेगा मालिकाना हक

Himachal High Court Polyandry Property Ruling: हिमाचल हाई कोर्ट ने बहुपति प्रथा के तहत संपत्ति के उत्तराधिकार पर बड़ा फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि जब तक जीवित भाई मौजूद हैं, तब तक अगली पीढ़ी को जायदाद पर मालिकाना हक नहीं मिलेगा।
Himachal News: Himachal High Court Hon’ble Mr. Justice Rakesh Kainthla

Himachal High Court: हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने राज्य के पहाड़ी और जनजातीय क्षेत्रों में सदियों पुरानी बहुपति प्रथा के तहत संपत्ति के उत्तराधिकार और बंटवारे को लेकर एक बेहद महत्त्वपूर्ण कानूनी निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि बहुपति प्रथा के अंतर्गत यदि संयुक्त विवाह में शामिल किसी एक भाई की मृत्यु हो जाती है, तो उसकी संपत्ति तुरंत उसके बच्चों को हस्तांतरित नहीं होगी। इसके बजाय, उस संपत्ति पर पहले उसके जीवित (छोटे या बड़े) भाई का कानूनी अधिकार होगा।

अदालत के आदेश के अनुसार, जब संयुक्त विवाह में शामिल परिवार के सभी भाइयों की मृत्यु हो जाती है, केवल उसी स्थिति में अगली पीढ़ी यानी बच्चों को संपत्ति में मालिकाना हक प्राप्त होता है या वे बंटवारे की मांग करने के हकदार बनते हैं। जस्टिस राकेश कैंथला की पीठ ने करीब दो दशक पुराने एक दीवानी मामले की अपील को खारिज करते हुए यह ऐतिहासिक निर्णय दिया है।

दरअसल यह पूरा मामला शिमला जिले की रोहड़ू तहसील के एक हिंदू संयुक्त परिवार से जुड़ा हुआ है, जहां दो भाइयों की एक ही साझा पत्नी थी। इसमें से एक भाई की मृत्यु वर्ष 1935 में हो गई थी, जो भारत में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम लागू होने से पहले का समय था। उस समय भाई की मृत्यु के पश्चात राजस्व विभाग ने नियमानुसार पूरी संपत्ति का इंतकाल जीवित बचे दूसरे भाई के नाम पर दर्ज कर दिया था।

इसके वर्षों बाद, मृतक भाई के पोतों ने इस इंतकाल और अपने दादा की अल्पसंख्यक स्थिति के दौरान हुए पारिवारिक बंटवारे को अदालत में चुनौती दी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि उनका मामला पारंपरिक मिताक्षरा हिंदू कानून के अंतर्गत आता है। इस आधार पर वे अपने दादा की मृत्यु के बाद उनकी पूरी संपत्ति के एकमात्र वैध कानूनी वारिस हैं और उनका इंतकाल रद्द किया जाना चाहिए।

हाई कोर्ट ने इस मामले पर गहराई से विचार करते हुए माना कि चूंकि एक भाई की मृत्यु के समय दूसरा भाई जीवित था, इसलिए राजस्व विभाग द्वारा जीवित भाई के नाम किया गया इंतकाल पूरी तरह से वैध और स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुकूल था। अदालत ने टिप्पणी की कि भाइयों के जीवित रहते हुए पोतों द्वारा दायर की गई यह याचिका पूरी तरह से निराधार थी। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के पूर्व निर्णय को बरकरार रखते हुए याचिकाकर्ताओं की अपील को पूरी तरह से खारिज कर दिया।

उल्लेखनीय है कि इस फैसले तक पहुंचने के लिए अदालत ने हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी और जनजातीय क्षेत्रों के समृद्ध इतिहास और पारंपरिक रीति-रिवाजों का गहन अध्ययन किया। न्यायाधीश राकेश कैंथला ने अपने निर्णय में दो प्रमुख ऐतिहासिक दस्तावेजों को मुख्य आधार बनाया। पहला आधार ‘पंजाब स्टेट गैजेटियर (1910)’ बना, जिसके अनुसार शिमला हिल्स और रोहड़ू तहसील के विभिन्न हिस्सों में ऐतिहासिक रूप से बहुपति प्रथा का चलन रहा है।

संपत्ति से जुड़ा यह विशेष नियम मूल रूप से खेती योग्य जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटने और टूटने से बचाने के लिए बनाया गया था। अदालत ने दूसरा आधार हिमाचल प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. वाई. एस. परमार द्वारा वर्ष 1975 में लिखी गई चर्चित पुस्तक ‘पालीएंड्री इन हिमालयाज’ (Polyandry in Himalayas) को बनाया।

इस पुस्तक का हवाला देते हुए कोर्ट ने रेखांकित किया कि इन क्षेत्रों में संयुक्त विवाह से जन्म लेने वाले बच्चे पूरे परिवार के सामूहिक बच्चे माने जाते हैं। जब तक परिवार के सभी पिता या भाई जीवित रहते हैं, तब तक बच्चों को अनाथ या पिताविहीन नहीं माना जाता। यही सामाजिक और कानूनी व्यवस्था इस क्षेत्र की ऐतिहासिक परंपरा रही है।

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