15th Finance Commission Himachal Pradesh: केंद्र सरकार ने 15वें वित्त आयोग के माध्यम से ग्रामीण विकास और पंचायतों के कायाकल्प के लिए करोड़ों रुपये की राशि स्वीकृत की, लेकिन पूर्व जनप्रतिनिधियों की नाकामी और ढुलमुल रवैए के कारण यह धरातल पर नहीं उतर सकी। दरअसल, हिमाचल में ग्रामीण विकास के लिए केंद्र ने 15वें वित्त का बजट जारी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, लेकिन अधिकतर पंचायतें इस पैसे को समय पर खर्च करने में पूरी तरह से नाकाम रहीं।
ऐसा ही एक मामला हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले के अंतर्गत आने वाले विकास खंड धर्मपुर से सामने आया है। बता दें कि केंद्र सरकार के 15वें वित्त आयोग द्वारा पंचायतों के कायाकल्प और विकास कार्यों के लिए भेजी गई करोड़ों रुपये की राशि प्रशासनिक उदासीनता और जनप्रतिनिधियों की नाकामी की भेंट चढ़ी हुई है, क्योंकि विकास खंड धर्मपुर के तहत आने वाली ग्राम पंचायतें अपने हिस्से का पैसा समय पर खर्च करने में पूरी तरह असमर्थ साबित हुई हैं।

दरअसल, यह चौंकाने वाला खुलासा बुधवार को ब्लॉक कार्यालय धर्मपुर के नए भवन को जनता को विधिवत रूप से समर्पित करने के लिए आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में हुआ। इस कार्यक्रम के दौरान सार्वजनिक किए गए आधिकारिक आंकड़ों से यह साफ हुआ है कि क्षेत्र की ग्राम पंचायतों में विकास की गति कितनी धीमी रही है और किस तरह से सरकारी धन का सही इस्तेमाल नहीं हो पाया है। बता दें कि 15वें वित्त आयोग का गठन 27 नवंबर 2017 को किया गया था। इस आयोग की सिफारिशों के आधार पर करों और राजस्व का आवंटन 1 अप्रैल 2020 से प्रभावी रूप से शुरू हुआ था।
आधिकारिक तौर पर सामने आई जानकारी के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों यानी वर्ष 2021 से लेकर वर्ष 2025 तक की अवधि के दौरान सरकार द्वारा 15वें वित्त आयोग के तहत धर्मपुर विकास खंड को 13 करोड़ रुपये से अधिक की भारी-भरकम राशि आवंटित की गई थी। इस राशि का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को मजबूत करना और स्थानीय स्तर पर विभिन्न लंबित विकास कार्यों को गति देना था।
हालांकि, जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट रही है। विकास खंड के अंतर्गत आने वाली अधिकतर ग्राम पंचायतें अपने हिस्से में आए इस बजट को धरातल पर उतारने में पूरी तरह नाकाम रहीं। आंकड़ों के अनुसार, कुल आवंटित राशि में से आधी से अधिक यानी लगभग 7 करोड़ रुपये के कार्य आज भी लंबित पड़े हैं। पंचायतों के पास बजट उपलब्ध होने के बाद भी लगभग 7 करोड़ रुपये की यह बड़ी धनराशि खर्च नहीं की जा सकी, जिसे प्रशासनिक स्तर पर एक गंभीर विफलता माना जा रहा है।
इस भारी चूक के पीछे के कारणों पर जब विस्तार से समीक्षा की गई, तो पूर्व में रहे पंचायत प्रधानों की बड़ी नाकामी और कार्यप्रणाली सामने आई। कुछ कार्यों में आपसी विवाद वजह रहे, लेकिन समीक्षा के दौरान यह बात प्रमुखता से उजागर हुई कि क्षेत्र के अधिकतर पूर्व प्रधान सरकार द्वारा तय किए गए मानकों और तकनीकी नियमों को पूरा नहीं कर पाए।
मानकों की इसी कमी और प्रशासनिक अनुभव के अभाव के चलते विकास कार्य अटके रहे और करोड़ों का बजट बिना उपयोग के ही पड़ा रह गया। यह नाकामी बड़े स्तर पर चूक है क्योंकि अगर यह राशि खर्च होती तो आगे के लिए नई राशि स्वीकृत होती, लेकिन पहले से जारी धनराशि खर्च नहीं होने के कारण नई राशि नहीं मिल पाई।
भौगोलिक और प्रशासनिक बदलावों की बात करें तो ब्लॉक कार्यालय धर्मपुर में पूर्व में इस पूरे क्षेत्र की स्थिति थोड़ी अलग थी। वर्ष 2021 से 2024 के कार्यकाल के दौरान पहले विकास खंड कार्यालय धर्मपुर के अंतर्गत 40 से अधिक पंचायतें शामिल थीं। इन्हीं पंचायतों के विकास का जिम्मा धर्मपुर ब्लॉक के पास था और इसी आधार पर 13 करोड़ रुपये से अधिक का यह बजट आवंटित किया गया था।
इसके बाद क्षेत्र में प्रशासनिक फेरबदल हुआ और विकास खंड कार्यालय पट्टा का गठन किया गया। पट्टा में नया ब्लॉक कार्यालय बन जाने के बाद धर्मपुर विकास खंड के अंतर्गत आने वाली कुछ पंचायतों को काटकर नए ब्लॉक में शामिल कर दिया गया। इस विभाजन के बाद धर्मपुर ब्लॉक में पंचायतों की संख्या भले ही कम हो गई, लेकिन 15वें वित्त आयोग का जो पैसा पूर्व में आवंटित हुआ था, उसकी स्थिति जस की तस बनी रही।
क्योंकि पंचायतों के पुनर्गठन और कुछ पंचायतों के कट जाने के बाद भी पुरानी आवंटित राशि का एक बड़ा हिस्सा लंबित पड़ा हुआ है। धर्मपुर ब्लॉक के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, यह अनपेक्षित राशि अभी भी लगभग 7 करोड़ रुपये के आसपास बनी हुई है, जिसे खर्च नहीं किया जा सका है, क्योंकि यह राशि पंचायतों के पास पड़ी है और कार्य लंबित हैं।
धर्मपुर ब्लॉक का यह मामला साफ करता है कि सिर्फ बजट मंजूर होना काफी नहीं है, बल्कि उसे समय पर और सही तरीके से खर्च करना भी उतना ही जरूरी है। करोड़ों रुपये होने के बावजूद काम का रुके रहना पंचायत स्तर पर लचर प्लानिंग को दिखाता है। अब सबसे बड़ी चुनौती और जिम्मेदारी नए पंचायत प्रतिनिधियों के सिर पर आ गई है कि वे इस बचे हुए ₹7 करोड़ के बजट को जल्द से जल्द नियमों के तहत खर्च करें।
इस पैसे को सही समय पर इस्तेमाल करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि अब देश में 16वां वित्त आयोग 1 अप्रैल, 2026 से लागू हो गया है और इसकी सिफारिशें 2026-27 से 2030-31 तक पांच वर्षों की अवधि के लिए प्रभावी रहेंगी। अगर पुरानी धनराशि को अब भी खर्च नहीं किया गया, तो आने वाले वक्त में नए वित्त आयोग के बजट का लाभ मिलने में भी बड़ी रुकावट आ सकती है। यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा कि नई पंचायतें इस पुराने पैसे का कितना इस्तेमाल कर पाती हैं।


















