Borderline Personality Disorder Symptoms: कल्पना कीजिए कि किसी व्यक्ति की भावनाएँ शांत नदी की तरह स्थिर न होकर एक ऐसे अशांत समुद्र की तरह हों, जिसमें हर पल तेज लहरें उठती रहती हैं। कभी अत्यधिक खुशी, कभी गहरा दुख, कभी किसी व्यक्ति से बहुत अधिक जुड़ाव महसूस होना और कुछ ही समय बाद उसी व्यक्ति से अचानक दूरी या तीव्र क्रोध का आ जाना।
यदि कोई व्यक्ति लगातार इस तरह के भावनात्मक उतार-चढ़ाव से गुजर रहा है, तो यह केवल सामान्य स्वभाव या व्यवहार की समस्या नहीं है। मनोविज्ञान की शोधार्थी शिल्पी शर्मा के अनुसार, यह एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य स्थिति ‘बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर’ (BPD) का स्पष्ट संकेत हो सकता है।

बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर एक बेहद जटिल मनोवैज्ञानिक विकार है, जो व्यक्ति की भावनाओं को नियंत्रित करने की क्षमता, उसकी आत्म-छवि, दैनिक व्यवहार और सामाजिक संबंधों को गहराई से प्रभावित करता है। इस स्थिति से जूझ रहे व्यक्ति अक्सर तीव्र भावनात्मक पीड़ा का अनुभव करते हैं। इसके बावजूद, समाज में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता की कमी के कारण इस विकार से पीड़ित लोगों को कई बार गलत समझ लिया जाता है।
आम तौर पर लोग ऐसे व्यक्तियों को “बहुत भावुक”, “अस्थिर” या “ड्रामा करने वाला” कहकर छोड़ देते हैं, जबकि वास्तविकता में वे अपनी तीव्र भावनाओं को समझने और उन्हें नियंत्रित करने के लिए हर पल कड़ा संघर्ष कर रहे होते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन्हें आलोचना की नहीं, बल्कि सही समझ, सामाजिक सहयोग और उचित उपचार की आवश्यकता होती है।
मनोविज्ञान की शोधार्थी शिल्पी शर्मा इस विषय पर मनोवैज्ञानिक डॉ. किरण रानी पंवार से बातचीत कि तो उन्होंने बताया कि बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर एक ऐसा जटिल व्यक्तित्व विकार है, जिसमें व्यक्ति की भावनाओं, आत्म-छवि, व्यवहार तथा पारस्परिक संबंधों में भारी अस्थिरता दिखाई देती है। इस विकार से प्रभावित व्यक्ति अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने में अत्यधिक कठिनाई अनुभव करता है। उसे हर समय अपने करीबी लोगों द्वारा अस्वीकृत किए जाने या अकेले छोड़ दिए जाने का गहरा भय सताता रहता है।
परिणामस्वरूप, उसके संबंधों में बार-बार उतार-चढ़ाव आते हैं और वह परिस्थितियों या व्यक्तियों को या तो अत्यधिक सकारात्मक अथवा अत्यधिक नकारात्मक दृष्टिकोण से देखने लगता है। कई बार सामान्य प्रतीत होने वाली घटनाएँ भी उसके भीतर तीव्र भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न कर देती हैं, जिससे उसके दैनिक जीवन, निर्णय लेने की क्षमता तथा सामाजिक कार्यप्रणाली पर गहरा प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
मनोवैज्ञानिक डॉ. किरण के अनुसार इस विकार के लक्षण प्रत्येक व्यक्ति में अलग-अलग हो सकते हैं। सामान्य रूप से इसके प्रमुख लक्षणों में भावनाओं में अत्यधिक उतार-चढ़ाव होना, उन्हें नियंत्रित करने में कठिनाई आना, करीबी लोगों द्वारा छोड़ दिए जाने का गहरा डर सताना और रिश्तों में अत्यधिक जुड़ाव के बाद अचानक दूरी बना लेना शामिल है।
इसके अलावा, पीड़ित व्यक्ति स्वयं की पहचान और आत्म-छवि को लेकर हमेशा भ्रम में रहता है। उसे अत्यधिक क्रोध आता है और वह इस क्रोध को नियंत्रित करने में असमर्थ रहता है। अंदर से लगातार खालीपन महसूस होना, अचानक जोखिमपूर्ण व्यवहार जैसे आवेगपूर्ण निर्णय लेना, तनाव की स्थिति में अत्यधिक संदेह करना या वास्तविकता से अलग महसूस करना तथा स्वयं को नुकसान पहुँचाने वाले विचार या व्यवहार करना भी इस बीमारी के मुख्य लक्षण हैं।

मनोविज्ञान की शोधार्थी शिल्पी शर्मा द्वारा किए शोध में भी इस बात की पुष्टि होती है कि चिकित्सकीय शोध के अनुसार, BPD के विकास के पीछे कोई एक निश्चित कारण नहीं होता, बल्कि कई जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारक मिलकर इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं।
- पहला कारण आनुवंशिक प्रभाव है, यदि परिवार में पहले से ही किसी व्यक्ति को मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ रही हों, तो पीड़ित में इस विकार के विकसित होने की संभावना काफी बढ़ जाती है।
- दूसरा कारण मस्तिष्क से जुड़े कारक हैं, जिसमें भावनाओं को नियंत्रित करने वाले मस्तिष्क के क्षेत्रों की कार्यप्रणाली में अंतर आने से भावनात्मक संतुलन प्रभावित होता है।
- तीसरा कारण बचपन के अनुभव हैं, जैसे बचपन में भावनात्मक उपेक्षा, असुरक्षित वातावरण, पारिवारिक संघर्ष या किसी प्रकार का मानसिक आघात। इसके अलावा, लगातार तनाव, अस्थिर संबंध और जीवन की कठिन परिस्थितियाँ जैसे सामाजिक व पर्यावरणीय कारक भी इस विकार के जोखिम को बढ़ाते हैं।
बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर का सबसे गंभीर प्रभाव व्यक्ति के आपसी रिश्तों पर दिखाई देता है। ऐसे व्यक्ति किसी से बहुत गहरा जुड़ाव तो महसूस करते हैं, लेकिन अस्वीकृति या दूरी का मामूली डर भी उन्हें अचानक उग्र भावनात्मक प्रतिक्रिया देने के लिए प्रेरित कर सकता है। वे कभी-कभी किसी व्यक्ति को अपना आदर्श मानने लगते हैं, लेकिन छोटी-सी निराशा के बाद ही उसी व्यक्ति के प्रति उनके मन में अत्यधिक नकारात्मक भाव विकसित हो जाते हैं।
यह व्यवहार वे जानबूझकर नहीं करते, बल्कि यह उनकी तीव्र भावनाओं और आंतरिक असुरक्षा की भावना का परिणाम होता है। इसका प्रभाव उनके शैक्षिक प्रदर्शन, व्यावसायिक कार्यक्षमता, सामाजिक समायोजन तथा आत्मविश्वास को भी कमजोर करता है, जिससे उन्हें संतुलित और स्थिर जीवनशैली बनाए रखने में बड़ी कठिनाई होती है।
इस विकार का सटीक निदान केवल किसी योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ, जैसे नैदानिक मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक द्वारा ही किया जाना चाहिए। इसके लिए व्यक्ति के व्यवहार, भावनात्मक अनुभवों, जीवन के इतिहास और मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित जानकारी का विस्तृत मूल्यांकन किया जाता है। हालांकि, उचित उपचार और सहयोग के माध्यम से इसके लक्षणों में सुधार पूरी तरह संभव है।
उपचार में मनोचिकित्सा (Psychotherapy) मुख्य भूमिका निभाती है, जिसमें भावनाओं को नियंत्रित करने और तनाव से निपटने के लिए ‘डायलेक्टिकल बिहेवियर थेरेपी’ (DBT), नकारात्मक विचारों को बदलने के लिए ‘कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी’ (CBT) और पुराने भावनात्मक पैटर्न को समझने के लिए ‘स्कीमा थेरेपी’ का उपयोग किया जाता है।
BPD के लिए कोई विशेष दवा नहीं है, लेकिन यदि व्यक्ति में चिंता, अवसाद या अन्य मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ मौजूद हों, तो चिकित्सक आवश्यकतानुसार दवाएँ सुझा सकते हैं। इस पूरी उपचार प्रक्रिया में परिवार और मित्रों का सहयोग सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। परिजनों को चाहिए कि वे पीड़ित व्यक्ति की भावनाओं को समझने का प्रयास करें, उनकी आलोचना करने या नकारात्मक टिप्पणियां देने से बचें और धैर्यपूर्वक उनका सहयोग करें।
सही उपचार, नियमित थेरेपी, आत्म-जागरूकता और मजबूत सामाजिक सहयोग के माध्यम से पीड़ित व्यक्ति अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है। समाज को इस विकार को कलंक की दृष्टि से देखने के बजाय सहानुभूति और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, क्योंकि भावनात्मक तूफ़ानों के बीच भी उपचार, उम्मीद और बदलाव की राह हमेशा मौजूद रहती है।
-मनोविज्ञान शोधार्थी शिल्पी शर्मा


















