Himachal News: देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में मंगलवार का दिन हिमाचल प्रदेश के आर्थिक और जल संसाधनों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ने जा रहा है। बता दें कि हिमाचल प्रदेश सरकार और देश के अन्य पांच प्रमुख राज्यों के बीच लंबे समय से लंबित किशाऊ बांध परियोजना को लेकर समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की विशेष पहल और केंद्र सरकार के समक्ष मजबूती से रखे गए राज्य के पक्ष के बाद यह ऐतिहासिक मोड़ संभव हो सका है।
जानकारी के मुताबिक इस समझौते के लागू होते ही हिमाचल प्रदेश के राजकोष को सालाना लगभग 600 करोड़ रुपये का सीधा राजस्व प्राप्त होगा। नई दिल्ली में आयोजित होने वाले इस उच्चस्तरीय हस्ताक्षर समारोह में केंद्रीय ऊर्जा मंत्री और केंद्रीय जलशक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल की गरिमामयी उपस्थिति रहेगी। इसके साथ ही इस बहुउद्देशीय परियोजना से लाभान्वित होने वाले छह राज्यों, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के मुख्यमंत्री भी इस मंच पर मौजूद रहकर एमओयू पर दस्तखत करेंगे।
आठ साल पुराना गतिरोध समाप्त, ₹800 करोड़ के वित्तीय बोझ से बचा हिमाचल
उल्लेखनीय है कि आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे हिमाचल प्रदेश के लिए किशाऊ बांध परियोजना में अपनी हिस्सेदारी की लागत का भुगतान करना एक बड़ी अड़चन बना हुआ था। यह गतिरोध बीते आठ वर्षों से बना हुआ था। इस वर्ष जून महीने में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय ऊर्जा मंत्री के साथ आयोजित बैठक में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने तर्कसंगत तरीके से राज्य का पक्ष प्रस्तुत किया था।
राज्य सरकार ने केंद्र को स्पष्ट किया कि जब इस परियोजना से उत्पन्न जल का लाभ देश के छह बड़े राज्यों को मिलना है और यह बांध हिमाचल की सीमा व नदी पर निर्मित हो रहा है, तो हिमाचल प्रदेश 800 करोड़ रुपये की पावर कंपोनेंट लागत क्यों वहन करे। केंद्र सरकार ने इस भौगोलिक और व्यावहारिक तर्क को स्वीकार करते हुए हिमाचल को इस वित्तीय अंशदान से पूरी तरह मुक्त कर दिया।
परियोजना की लागत संरचना और हिमाचल को मिलने वाले लाभ
किशाऊ बांध परियोजना के मुख्य रूप से दो भाग हैं, वाटर कंपोनेंट और पावर कंपोनेंट। इस संशोधित समझौते के तहत वाटर कंपोनेंट के लाभार्थी राज्य (दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और उत्तराखंड) हिमाचल प्रदेश के हिस्से की पावर कंपोनेंट लागत का वहन करेंगे, जिसकी कुल राशि लगभग 2000 करोड़ रुपये है।
इसके बदले में हिमाचल प्रदेश को बिना किसी पूंजीगत निवेश के हर साल 100 करोड़ यूनिट बिजली प्राप्त होगी, जिसका बाजार मूल्य लगभग 600 करोड़ रुपये है। यह वित्तीय व्यवस्था पहाड़ी राज्य के लिए एक स्थायी राजस्व स्रोत साबित होगी।
राष्ट्रीय महत्व की अंतरराज्यीय परियोजना की मुख्य विशेषताएं
हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर टौंस नदी पर बनने वाली यह किशाऊ बांध परियोजना कुल 15,000 करोड़ रुपये की लागत से तैयार होगी। इसे वर्ष 2008 में ही ‘राष्ट्रीय महत्व की परियोजना’ का दर्जा दिया जा चुका था।
- ऊंचाई और क्षमता: इस बांध की कुल ऊंचाई 236 मीटर होगी, जो ऐतिहासिक भाखड़ा बांध की ऊंचाई से भी अधिक है।
- विद्युत उत्पादन: परियोजना की कुल स्थापित क्षमता 422 मेगावाट होगी। इससे उत्पादित कुल बिजली का 50-50 प्रतिशत हिस्सा हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बीच समान रूप से विभाजित होगा।
- जल वितरण संरचना: बांध से कुल 1324 मिलियन क्यूबिक लीटर पानी उपलब्ध होगा, जिससे 97 हजार हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि की सिंचाई संभव हो सकेगी।
लाभार्थी राज्यों का जल आवंटन:
- हरियाणा: सबसे बड़ा जल लाभार्थी राज्य होगा, जिसे कुल पानी का 47.18 प्रतिशत यानी 5.71 बिलियन क्यूबिक लीटर पानी मिलेगा।
- उत्तर प्रदेश: दूसरा बड़ा लाभार्थी, जिसे 3.71 बिलियन क्यूबिक पानी प्राप्त होगा।
- दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी को पेयजल संकट से राहत दिलाते हुए 0.724 बिलियन क्यूबिक पानी का हिस्सा दिया जाएगा।
बता दें कि मंगलवार को दिल्ली में होने वाले इस एमओयू पर हस्ताक्षर के साथ ही उत्तर भारत के छह राज्यों में जल और ऊर्जा सुरक्षा का एक नया दौर शुरू होने जा रहा है।


















