Police Transfer Politics: कहते हैं थाने में कानून की हाजिरी जरूरी है, लेकिन इन दिनों सियासत के गलियारों में एक थाने के दरोगा की चर्चा है। सुना है कि साहब ने लगातार दो महीने तक माननीय के दरबार में हाजिरी लगाने की जहमत नहीं उठाई। तो नतीजा यह हुआ कि कानून-व्यवस्था संभालने वाली कुर्सी ही तबादले की चपेट में आ गई।
चर्चा है कि थाने के नए-नवेले दरोगा ने लगातार दो महीने तक इलाके के माननीय के दरबार में अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराई। न सलाम, न हालचाल, न कोई विशेष मुलाकात। बस अपनी ड्यूटी, कानून और फाइलों में व्यस्त रहे। लेकिन दरबार में कुर्सियां भी शायद बहुत कुछ समझती हैं। दो महीने की गैरहाजिरी के बाद अचानक दरोगा की कुर्सी के नीचे से जमीन खिसकने की चर्चा शुरू हो गई और देखते ही देखते तबादले की फाइल ने दौड़ लगा दी।
दरोगा की मुश्किल बढ़ी तो उनके शुभचिंतकों और कुछ सियासी खासमखासों ने माननीय के दरबार में दस्तक दी। सुना है कि पार्टी से जुड़े कुछ सियासी खासमखास यह समझाने पहुंचे कि दरोगा अभी नए हैं, युवा हैं, राजनीति के पुराने तौर-तरीकों से अभी पूरी तरह परिचित नहीं हैं। यानी उन्हें शायद पुलिस की किताब तो पढ़ाई गई, लेकिन “दरबार प्रबंधन” का अध्याय छूट गया। समझाने वालों की ओर से कथित तौर पर यह संदेश भी था कि अधिकारी का तबादला रोक दिया जाए।
आखिर नए अधिकारी को भी कुछ सीखने का मौका मिलना चाहिए कि कानून की किताब और राजनीतिक व्यवहार की किताब में कई बार पन्ने अलग-अलग होते हैं। लेकिन दरबार में बैठे माननीय ने भारी सभा के बीच कथित तौर पर साफ संकेत दे दिया—“दरोगा के मामले से जुड़े लोग बाहर जाएं।” उनके बारे में अब कोई बात नहीं सुनी जाएगी। अब इसे गुस्सा कहें, अनुशासन कहें या दरबार की मर्यादा—व्याख्या करने वालों की कमी नहीं है। खैर, सियासी खासमखास तो अपना बचा-खुचा सम्मान लेकर लौट आए, पर अब चर्चा यही है कि अगले चुनाव में बूथ पर लीड कौन दिलाएगा…
इस पूरे घटनाक्रम ने एक पुराना सवाल तो खड़ा कर दिया है—क्या थानेदार का मूल्यांकन उसकी पुलिसिंग से होगा या दरबार में उसकी उपस्थिति से? इलाके में कानाफूसी है कि माननीय ऐसी जगह ऐसा मोहरा चाहते हैं जो थाने की “कमाई” बढ़ाने की कला जानता हो। अब यहां कमाई का मतलब सरकारी राजस्व है, पुलिस विभाग की उपलब्धियां हैं या कुछ और—यह तो चर्चा करने वाले ही जानें। वैसे भी सरकारी नौकरी में “कमाई” शब्द बड़ा संवेदनशील है। इसलिए इसे फिलहाल अफवाह की अलमारी में ही रखा जाए।
एक दूसरी चर्चा यह भी है कि दरोगा ने माननीय से पहले दूसरी पार्टी से जुड़े अपने कुछ रिश्तेदारों के घर पर आयोजित समारोह पहुंचकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवा दी। बस, फिर सियासी गलियारों में सवाल उठने लगे कि माननीय को यह बात नागवार गुजरी या नहीं, और अगर गुजरी तो आखिर क्यों? कानाफूसी यहां तक है कि सवाल यह भी उठा कि दरोगा ने दूसरी पार्टी से जुड़े लोगों के दरबार में चरण-स्पर्श आखिर क्यों कर दिया।
बहरहाल, ये सब बातें फिलहाल सुनी-सुनाई चर्चाओं और सियासी गलियारों की कानाफूसियों से आगे कुछ नहीं हैं। लेकिन चर्चा अब भी वही है—दरोगा की ड्यूटी कानून के प्रति है या हाजिरी सिर्फ एक ही दरबार में लगनी चाहिए?
कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा तब आया, जब दरोगा ने कथित तौर पर किसी होटल में हुई मुलाकात में कानून और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए अपना पक्ष समझाने की कोशिश की। कहा कि नियमों का उल्लंघन होगा तो कार्रवाई होगी। खैर, इस मुलाकात की चर्चा भी सियासी गलियारों में है। दरोगा शायद यह भूल गए कि कानून की किताब में सुप्रीम कोर्ट सबसे ऊपर हो सकता है, लेकिन राजनीति की किताब में समय और परिस्थिति ही सबसे बड़े अध्याय होते हैं।
नतीजा सामने है—एक तरफ कानून की धाराएं हैं और दूसरी तरफ कुर्सी की धारा बदल गई।
यह पूरा मामला सच है, आधा सच है या राजनीतिक गलियारों की चाय के साथ तैयार हुई कहानी—इसका फैसला संबंधित लोग ही कर सकते हैं।
अगर थानेदार अपराधियों के सामने कानून की किताब खोलता है, तो क्या उसे जनप्रतिनिधियों के सामने भी वही किताब खोलनी चाहिए?
और अगर किसी अधिकारी की सबसे बड़ी गलती यह हो जाए कि उसने दो महीने तक दरबार में हाजिरी नहीं लगाई, तो फिर पुलिस विभाग में शायद एक नया प्रशिक्षण मॉड्यूल शुरू करने का समय आ गया है—
“अपराध नियंत्रण से पहले दरबार प्रबंधन।”
क्योंकि लोकतंत्र में कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए।
बाकी, हाजिरी कहां लगानी है—यह सवाल शायद अभी भी शोध का विषय है।
नोट: यह लेख पूर्णतः व्यंग्य और गलियारों की चर्चाओं पर आधारित है। इसमें व्यक्त विचार किसी जीवित/मृत व्यक्ति की मानहानी के उद्देश्य से नहीं लिखे गए हैं।


















