Mandi News: हिमाचल प्रदेश में सवर्ण आयोग की मांग को लेकर हुए धरना-प्रदर्शन की आंच अब कांग्रेस के भीतर तक पहुंच गई है। पार्टी के अल्पसंख्यक चेहरे और पूर्व में द्रंग विधानसभा सचिव रहे फरजंद अली गुर्जर ने सभी पदों के साथ-साथ कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से पार्टी के मंत्रियों पर संविधान की अनदेखी और जाति-धर्म के नाम पर समाज को बांटने का आरोप लगाया है।
“संविधान की परवाह नहीं की”
गुर्जर का आरोप है कि एक राजनीतिक दल राष्ट्रीय देव भूमि पार्टी द्वारा राजधानी शिमला में सचिवालय के बाहर प्रदर्शन के दौरान तोड़फोड़ हुई, फिर भी कांग्रेस के मंत्री एससी-एसटी वर्ग और संविधान की परवाह किए बिना प्रदर्शनकारियों के साथ खड़े दिखे। उनके मुताबिक पंचायती राज मंत्री अनिरुद्ध सिंह ने प्रदर्शन का खुला समर्थन किया और कुछ अन्य मंत्रियों की भूमिका पर भी सवाल हैं।
उन्होंने कहा कि इसके बावजूद किसी के खिलाफ कार्रवाई न होना बताता है कि पार्टी नेतृत्व इस रवैये पर मौन सहमति दे रहा है। उन्होंने शिमला के संजौली में एक मस्जिद को तोड़ने पहुंचे लोगों का भी जिक्र भी किया और आरोप लगाया कि वहां भी मंत्रियों ने उनका समर्थन किया था।
“धरना हक है, पर संवैधानिक तरीके से”
गुर्जर ने साफ कहा कि धरना-प्रदर्शन हर नागरिक का अधिकार है और हर वर्ग को अपने आयोग की मांग का हक है, लेकिन तरीका संवैधानिक होना चाहिए। उनका सवाल है कि जब पिछली भाजपा सरकार के समय सामान्य वर्ग आयोग का प्रस्ताव आया था, तो कांग्रेस सरकार उसे आगे बढ़ाकर जमीन पर क्यों नहीं उतारती। उनके मुताबिक भीड़ देखकर राजनीति चमकाना सामान्य वर्ग के लोगों के साथ भी छल है।
“जो विचारधारा जोड़ती नहीं, तोड़ती है”
गुर्जर ने कहा कि देश में एससी-एसटी, बहुजन और अल्पसंख्यक समाज का बड़ा हिस्सा, जो उनके अनुसार करीब 80 प्रतिशत है, परंपरागत रूप से कांग्रेस के साथ रहा है। उन्होंने कहा, “हम विचारों से जुड़े थे। जब विचारों का विघटन दिखा और संगठन ने भी कोई कार्रवाई नहीं की, तो पार्टी में रहने का कोई औचित्य नहीं बचा।” उन्होंने आरोप लगाया कि जो पार्टी दूसरों पर गैर-संवैधानिक राजनीति का आरोप लगाती है, वही अब जातिवाद और धार्मिक के आरोपों के घेरे में है।
“संगठन और नेतृत्व पर सवाल”
इस पूरे मामले में गुर्जर ने मुख्यमंत्री और संगठन की चुप्पी पर भी सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि जब उच्च पदों पर बैठे लोग संवैधानिक मर्यादा भूलकर भीड़ की राजनीति करें और संगठन मूकदर्शक बना रहे, तो पार्टी की विचारधारा पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
वहीं प्रजासत्ता बातचीत में कांग्रेस से इस्तीफा देने के बाद पूर्व द्रंग विधानसभा सचिव फरजंद अली गुर्जर ने कहा कि कार्रवाई और प्रदर्शन के अधिकार, दोनों में सबके लिए एक जैसा पैमाना नहीं अपनाया जाता।
“अवैध है तो अवैध है”
शिमला की मस्जिद का जिक्र करते हुए गुर्जर ने कहा कि अगर उसे अवैध मानकर तोड़ने की नौबत आई, तो वे इसे सही मानते हैं। उन्होंने कहा कि जो अवैध है, वह अवैध है, लेकिन यही कार्रवाई मंदिरों और अन्य अवैध भवनों पर भी होनी चाहिए। उन्होंने खुद को वैज्ञानिक सोच से जुड़ा बताते हुए कहा कि वे अक्सर यह सवाल करते हैं कि मंदिर और मस्जिद से समाज को आखिर क्या मिलता है। क्या कोई ऐसा आविष्कार किया हो या ऐसा कम किया हो जिससे जनहित का काम हुआ हुआ।
“हमें रोका जाता है”
गुर्जर ने कहा कि वे इंसानियत के नाते जनहित के मामलों में धर्म और जाति देखे बिना धरने-प्रदर्शन में जाते हैं। उनके अनुसार शिमला में प्रदर्शन के लिए चौड़ा मैदान तय है, फिर भी उन्हें वहां पहुंचने से पहले ही रोक दिया जाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि सवर्ण आयोग की मांग करने वाले प्रदर्शनकारियों को सचिवालय के पास तक पुलिस ने नहीं रोका, और इसी वजह से तोड़फोड़ की घटनाएं हुईं। उनका दावा है कि अगर दलित समाज या अन्य वर्ग प्रदर्शन करता, तो उसे पहले ही रोक दिया जाता।
उन्होंने कहा कि धर्म के नाम पर मुसलमानों को और जाति के नाम पर एससी-एसटी समाज को निशाना बनाया जाता है।
“मंत्री को भीड़ दिखी, मर्यादा नहीं”
गुर्जर ने आरोप लगाया कि सामान्य वर्ग से आने वाले मंत्री, जो संवैधानिक प्रक्रिया से चुनकर बने हैं, राजनीतिक लाभ के लिए अपने वर्ग और धर्म के साथ खड़े हो जाते हैं। उनके मुताबिक इससे यह संदेश जाता है कि तोड़फोड़ करने वाला अपने वर्ग का हो तो कार्रवाई नहीं होगी, और पार्टी की विचारधारा व शपथ को भुला दिया जाता है।
“जो चीज खलती है, उससे अच्छा है कि उस विपक्ष में रहें जो खुलकर विरोध तो करता है। लेकिन कांग्रेस मीठे जहर की तरह हमें ही पागल बना रही है,” उन्होंने कहा। उन्होंने जोड़ा कि मंत्री को भीड़ तो दिख गई, लेकिन अपनी संवैधानिक मर्यादा नहीं दिखी।




















