NCB Drug Bust Case: नशे के तौर पर इस्तेमाल होने वाली दवाओं के कथित अवैध कारोबार से जुड़े एक बड़े और चर्चित मामले में अब अदालती कार्रवाई पर देश भर की नजरें टिकी हुई हैं। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो यानी एनसीबी से संबंधित यूनियन ऑफ इंडिया बनाम परशोत्तम लाल मामले में शिकायतकर्ता पक्ष ने अदालत से बेहद कड़ा रुख अपनाने की मांग की है। शिकायतकर्ता पक्ष ने परशोत्तम लाल गोयल, मणिक गोयल और कोनिक गोयल को आधिकारिक तौर पर घोषित अपराधी करार देने की अपील की है।
हालांकि, इस महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ पर अमृतसर स्थित मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने 21 अक्तूबर 2026 को तुरंत कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया। अदालत ने मामले की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए बचाव पक्ष को जरूरी कानूनी दस्तावेज और अपनी विस्तृत दलीलें पेश करने के लिए 29 अक्तूबर तक का समय प्रदान किया। इस अंतरिम आदेश के बाद फिलहाल तीनों आरोपियों को घोषित अपराधी करार नहीं दिया गया है।
कोर्ट में शिकायतकर्ता और बचाव पक्ष के तर्क
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने अपना पक्ष मजबूती से रखते हुए माननीय सुप्रीम कोर्ट के 18 मार्च 2026 के अंतरिम राहत संबंधी आदेश का प्रमुखता से हवाला दिया। इसके साथ ही एनडीपीएस (NDPS) एक्ट की धारा 67 के तहत की गई कार्रवाई और प्रक्रियात्मक पहलुओं को अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया।
दूसरी ओर, शिकायतकर्ता पक्ष ने आरोपियों के अदालत में पेश न होने के रवैये को मुख्य मुद्दा बनाया और कड़ा ऐतराज जताया। शिकायतकर्ता पक्ष का स्पष्ट कहना था कि कानूनी प्रक्रिया में लगातार हो रही देरी और पेशी से बचने की कोशिशों के कारण आरोपियों पर सख्त कानूनी प्रावधान लागू किए जाने चाहिए।
डिजिटल विजन फार्मा और उधमपुर कांड का पुराना इतिहास
इस पूरे घटनाक्रम के तार कालाअंब स्थित डिजिटल विजन फार्मा से भी जुड़े बताए जा रहे हैं, जिसका नाम वर्ष 2019-20 में जम्मू-कश्मीर के उधमपुर जिले में हुए एक दर्दनाक हादसे में सामने आया था। उस दौरान दूषित कफ सिरप के सेवन से 12 मासूम बच्चों की जान चली गई थी। इस भयावह मामले में जांच की गति और न्यायिक कार्रवाई को लेकर लंबे समय से गंभीर सवाल उठते रहे हैं।
बाद में इसी कंपनी से जुड़े कथित अवैध दवा डायवर्जन नेटवर्क की जांच के दौरान एनसीबी को बड़ी सफलता मिली थी। जांच एजेंसी ने भारी मात्रा में ट्रामाडोल और अन्य प्रतिबंधित साइकोट्रॉपिक दवाएं बरामद किए जाने की आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक की थी, जिससे दवा बाजार में चल रहे अवैध नेटवर्क की परतें खुली थीं।
ओरिसन फार्मा पर नियामकीय कार्रवाई का रिकॉर्ड
दवा निर्माण इकाइयों की कार्यप्रणाली केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं है। हिमाचल प्रदेश स्थित ओरिसन फार्मा इंटरनेशनल से संबंधित सरकारी रिकॉर्ड और आदेशों में एनडीपीएस अधिनियम के तहत आने वाली संवेदनशील दवाओं के निर्माण, अनुमतियों और लाइसेंस रद्द करने संबंधी कार्रवाइयों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
यह प्रशासनिक रिकॉर्ड राज्य में संचालित दवा निर्माण इकाइयों की निगरानी व्यवस्था पर बेहद गंभीर सवाल खड़े करता है। हालांकि, कानूनी और निष्पक्ष दृष्टिकोण से इस कंपनी और मौजूदा एनसीबी मामले के बीच के प्रत्यक्ष संबंधों या किसी व्यक्ति विशेष की व्यक्तिगत आपराधिक जिम्मेदारी को स्वतंत्र रूप से प्रमाणित किया जाना अभी बाकी है।
सरकार और जांच एजेंसियों की जवाबदेही पर उठते सवाल
औषधीय दवाओं का नशा कारोबार में अवैध रूप से डायवर्जन केवल कानून-व्यवस्था का एक साधारण मामला नहीं है, बल्कि यह देश के युवाओं के भविष्य और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा एक गंभीर राष्ट्रीय मुद्दा है। ऐसे बड़े और संवेदनशील मामलों में निष्पक्ष जांच, निर्धारित समयसीमा के भीतर कार्रवाई, और आरोपियों की अदालत में नियमित पेशी सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है।
इसके साथ ही, दवा निर्माण इकाइयों के लाइसेंसिंग तंत्र और प्रतिबंधित पदार्थों की पूरी आपूर्ति शृंखला की पारदर्शी जांच समय की मांग है। अब मुख्य सवाल यह है कि बड़े दवा कारोबार से जुड़े इन मामलों में कानूनी प्रक्रिया को रफ्तार देने के लिए शासन और संबंधित एजेंसियां क्या ठोस कदम उठाती हैं। हालांकि अदालत में आरोप सिद्ध होना अभी बाकी है, लेकिन इस स्तर पर निष्पक्ष जांच में कोई ढिलाई नहीं होनी चाहिए।




















