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Organic Farming: भारत की एक बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि या कृषि से जुड़े क्षेत्रों पर निर्भर है। कृषि केवल आजीविका का साधन नहीं, अपितु देश की खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता का आधार भी है। इसलिए खेती से जुड़ा कोई भी बड़ा बदलाव केवल भावनाओं या देखादेखी के आधार पर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों, वैश्विक अनुभवों और किसानों की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
आज जैविक खेती को लेकर विश्वभर में चर्चा तेज़ है। जुलाई 2026 में केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख ने रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग एवं व्यापार पर पूर्णतः प्रतिबंध लगाया है। यह निःसंदेह पर्यावरण हित में एक सकारात्मक पहल है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या किसी देश या प्रदेश में इसे एक झटके में अचानक से लागू किया जा सकता है?

पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जैविक खेती को बढ़ावा देने की मांग बढ़ी है। इसका प्रमुख कारण रासायनिक उर्वरकों और पीड़कनाशियों के असंतुलित प्रयोग से मिट्टी की उर्वरता में गिरावट, भूजल प्रदूषण, जैव विविधता पर नकारात्मक प्रभाव तथा मानव स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताएं हैं। COVID-19 महामारी के बाद से लोगों में खानपान के प्रति एक अलग ही जागरूकता पैदा हुई है एवं अब वे सुरक्षित और रसायन मुक्त खाद्यान्न की तरफ ज़्यादा ध्यान देना पसंद करते हैं। ऐसे में जैविक खेती टिकाऊ कृषि का एक महत्वपूर्ण विकल्प बनकर उभरी है।
हालाँकि यहाँ पर हमें यह समझना आवश्यक है कि जैविक खेती केवल रासायनिक उर्वरकों को छोड़ देने का नाम नहीं है बल्कि यह एक ऐसी कृषि प्रणाली है, जिसमें मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने, जैविक खाद, हरी खाद, फसल चक्र, जैव उर्वरकों और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग से पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इस व्यवस्था को सफल बनाने के लिए पर्याप्त समय, आवश्यक प्रशिक्षण, जरूरी संसाधन और बाज़ार, इन चारों पहलुओं की आवश्यकता होती है।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जो किसान पिछले कई दशकों से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर है, क्या वह अगले ही मौसम में पूरी तरह जैविक खेती अपना सकता है?
इस प्रश्न का उत्तर व्यावहारिक रूप से ‘नहीं’ ही होगा। खेती में अचानक बदलाव से शुरुआती वर्षों में उत्पादन घट सकता है और यदि उत्पादन कम होगा तो किसानों की आय भी प्रभावित होगी और खाद्यान्न उत्पादन पर भी दबाव बढ़ेगा। भारत जैसे देश, जहाँ बढ़ती जनसंख्या के लिए खाद्य सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है, वहाँ किसी भी नीति को संतुलित दृष्टिकोण के साथ लागू करना आवश्यक है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के वैज्ञानिक लंबे समय से ‘एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन’ (Integrated Nutrient Management – INM) की सिफारिश करते रहे हैं। इस पद्धति में जैविक खाद, फसल अवशेष, हरी खाद तथा आवश्यकतानुसार संतुलित मात्रा में रासायनिक उर्वरकों का संयुक्त प्रयोग किया जाता है। इससे मिट्टी का स्वास्थ्य बेहतर बना रहता है, उत्पादन स्थिर रहता है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता भी धीरे-धीरे कम होती है। यही दृष्टिकोण भारतीय परिस्थितियों में अधिक उपयोगी माना जाता है।
संयुक्त राष्ट्र के ‘खाद्य एवं कृषि संगठन’ (FAO) का भी मानना है कि रासायनिक खेती से जैविक खेती में बदलाव एक क्रमिक प्रक्रिया है। इसमें मिट्टी के स्वास्थ्य को सुधारने, रासायनिक इनपुट को धीरे-धीरे कम करने, और पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने पर जोर दिया जाना चाहिए।
दुनिया के कुछ अनुभव भी यही संदेश देते हैं। जैसे सिक्किम ने 2000 के दशक में जैविक राज्य बनने का संकल्प लिया था जिसको पूरा करने के लिए किसानों को जैविक पद्धति के बारे में प्रशिक्षण दिया गया, रासायनिक उर्वरकों का उपयोग धीरे-धीरे कम किया गया, जैविक खाद, जैविक उर्वरक, केंचुए की खाद किसानों को उचित सब्सिडी पर उपलब्ध कराए गए और बाज़ार की व्यवस्था विकसित की गई। कई वर्षों की तैयारी के बाद 2016 में सिक्किम भारत का पूर्णतः जैविक राज्य घोषित हुआ। यह उदाहरण बताता है कि सफल परिवर्तन के लिए उपयुक्त समय, सुरक्षित योजना और निरंतर प्रयास आवश्यक हैं।
इसके विपरीत श्रीलंका ने 2021 में अचानक कृषि में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया। विश्व बैंक एवं श्रीलंका सरकार के आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि पर्याप्त तैयारी और वैकल्पिक व्यवस्था के अभाव से देश में गंभीर कृषि एवं आर्थिक संकट उत्पन्न हुआ। देश की मुख्य खाद्य फसल चावल के उत्पादन में लगभग 30 प्रतिशत एवं चाय की वार्षिक पैदावार लगभग 15 प्रतिशत तक घटी, किसानों की आय पर विपरीत असर पड़ा व अंततः सरकार को अपने निर्णय में बदलाव करना पड़ा। यह अनुभव स्पष्ट करता है कि कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्र में जल्दबाज़ी महँगी पड़ सकती है।
भारत की भौगोलिक एवं खाद्य परिस्थितियाँ अलग हैं। यहाँ हर राज्य की मिट्टी, जलवायु, सिंचाई व्यवस्था और फसल प्रणाली अलग है। इसलिए पूरे देश के लिए एक जैसी नीति प्रभावी नहीं हो सकती। जहाँ जैविक खेती की संभावनाएँ अधिक हैं, वहाँ इसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जबकि अन्य क्षेत्रों में चरणबद्ध तरीके से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने की रणनीति अपनाई जानी चाहिए।
सरकार, कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि विज्ञान केंद्रों की ज़िम्मेदारी है कि वे किसानों को वैज्ञानिक प्रशिक्षण दें, जैव उर्वरकों और जैविक खाद की उपलब्धता सुनिश्चित करें, प्रमाणन प्रक्रिया को सरल बनाएँ और जैविक उत्पादों के लिए बेहतर बाज़ार उपलब्ध कराएँ। सरकार जैविक खाद, जैविक उर्वरक, वर्मी कंपोस्ट आदि पर सब्सिडी देकर भी किसानों को जैविक खेती हेतु प्रोत्साहित कर सकती है। यदि किसानों को जैविक उत्पादों का उचित मूल्य तथा आवश्यक आर्थिक सहायता मिलेगी, तभी वे इस परिवर्तन को आत्मविश्वास के साथ अपनाएंगे।
जैविक खेती निःसंदेह भारत के कृषि भविष्य का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है, लेकिन इसका मार्ग भावनाओं से नहीं, बल्कि विज्ञान, प्रशिक्षण, अनुभव और चरणबद्ध बदलाव से होकर गुजरता है। हमारा उद्देश्य केवल रासायनिक उर्वरकों का विरोध करना नहीं, बल्कि ऐसी कृषि व्यवस्था विकसित करना होना चाहिए जो मिट्टी को स्वस्थ रखे, पर्यावरण की रक्षा करे, उपभोक्ताओं को सुरक्षित भोजन उपलब्ध कराए और सबसे महत्वपूर्ण किसान की आय और देश की खाद्य सुरक्षा को भी मजबूत बनाए।
यही कारण है कि जैविक खेती की दिशा में भारत को जल्दबाज़ी नहीं, बल्कि वैज्ञानिक समझदारी, चरणबद्ध रणनीति और किसानों के साथ साझेदारी का रास्ता अपनाना चाहिए क्योंकि किसान प्रयोग करने से नहीं डरता लेकिन उसकी मेहनत की फसल पर कोई जोखिम नहीं होना चाहिए।


















