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भारतीय रुपये में गिरावट: 95.40 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर लुढ़का, मिडिल ईस्ट के तनाव ने बढ़ाई चिंता

Rupee vs Dollar Today: मंगलवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 95.40 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया। कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और खाड़ी देशों में बढ़ते भू-राजनीतिक संकट ने घरेलू मुद्रा पर भारी दबाव पैदा किया है।
Published on: 5 May 2026
Indian Rupee Record Low - Rupee Crash: इजरायल-ईरान हमलों के बीच रुपया बुरी तरह टूटा, डॉलर के मुकाबले 86 के पार पहुंचा..!,

Indian Rupee Record Low: भारतीय वित्तीय बाजार में मंगलवार, 5 मई को उस समय हलचल मच गई जब अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया औंधे मुंह गिरकर 95.40 के नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में आई अचानक तेजी और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में डॉलर की निरंतर मांग ने रुपये की स्थिरता को पूरी तरह से डगमगा दिया है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक ऊर्जा गलियारों में बढ़ती अस्थिरता का सीधा असर भारतीय मुद्रा की साख पर पड़ रहा है।

इस भारी गिरावट के पीछे सबसे प्रमुख कारण मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में बढ़ता सैन्य तनाव है। ईरान द्वारा मिलिट्री एक्शन बढ़ाए जाने, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में कई व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाए जाने और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के एक महत्वपूर्ण तेल बंदरगाह पर आग लगने की घटनाओं ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिलाकर रख दिया है। इन खबरों के सार्वजनिक होते ही ब्रेंट क्रूड जुलाई फ्यूचर्स में लगभग 6 प्रतिशत का जबरदस्त उछाल देखा गया, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की आपूर्ति बाधित होने की आशंका गहरा गई है।

क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका की भूमिका ने भी बाजार की धारणा को प्रभावित किया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस बात को दोहराया है कि अमेरिकी नौसेना होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित रास्ता सुनिश्चित करेगी। यह स्थिति लगभग चार सप्ताह पहले हुए संघर्ष विराम के बाद से अब तक के सबसे बड़े सैन्य टकरावों में से एक मानी जा रही है। बाजार के जानकारों का संकेत है कि यदि यह तनाव जारी रहता है, तो इस महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग से शिपिंग गतिविधियां कम हो सकती हैं, जिससे कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहेंगी।

एएनजेड (ANZ) बैंक के विश्लेषकों के अनुसार, इस प्रकार के भू-राजनीतिक बदलावों से तेल की कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव बना रहेगा। भारत जैसे देश के लिए, जो अपनी तेल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, यह एक अत्यंत जोखिम भरा कारक है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने भारत के बाहरी आर्थिक संतुलन पर भारी दबाव डालना शुरू कर दिया है। इससे व्यापार की शर्तें प्रतिकूल हो रही हैं और डॉलर की मांग में बेतहाशा वृद्धि देखी जा रही है, जो अंततः रुपये को कमजोर कर रही है।

मुद्रा बाजार के ट्रेडर्स का कहना है कि रुपये की भविष्य की चाल पूरी तरह से तेल की कीमतों के उतार-चढ़ाव पर निर्भर है। एक निजी क्षेत्र के बैंक से जुड़े करेंसी ट्रेडर ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि जब तक कच्चे तेल की कीमतें काफी कम नहीं होतीं, तब तक घरेलू मुद्रा को किसी भी प्रकार की बड़ी राहत मिलने की संभावना क्षीण है। वर्तमान में तेल ही वह मुख्य कारक बना हुआ है जो पिछले कई हफ्तों से रुपये की गिरावट का मार्ग प्रशस्त कर रहा है।

बैंकिंग सूत्रों ने इस बात पर भी जोर दिया है कि सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों (OMCs) की ओर से डॉलर की निरंतर मांग बनी हुई है। इस मांग ने रुपये पर दबाव को और अधिक बढ़ा दिया है। दूसरी ओर, मुद्रा के इस उतार-चढ़ाव को देखते हुए निर्यातक (Exporters) हेजिंग को लेकर काफी सतर्क हो गए हैं। वहीं, आयातकों (Importers) ने करेंसी के जोखिम से बचने के लिए अपनी हेज पोजीशन को बढ़ा दिया है, जिससे बाजार में डॉलर की तरलता पर प्रभाव पड़ा है।

रुपये पर यह दबाव ऐसे संवेदनशील समय में आया है जब देश में विदेशी पूंजी का प्रवाह (Capital Inflow) सीमित बना हुआ है। पूंजी प्रवाह में कमी के कारण वे सुरक्षात्मक बफर (Buffers) कम हो रहे हैं जो सामान्य परिस्थितियों में करेंसी को स्थिरता प्रदान करने में सहायक होते हैं। बाजार सहभागियों का स्पष्ट मानना है कि मजबूत इनफ्लो के अभाव में मौजूदा बाहरी चुनौतियों के बीच रुपये को तत्काल कोई ठोस समर्थन मिलता नहीं दिख रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सीआर फॉरेक्स एडवाइजर्स के प्रबंध निदेशक अमित पाबारी ने बाजार की इस विषम स्थिति का विश्लेषण करते हुए कहा कि जब तेल की कीमतें इतनी तेजी से बढ़ रही हों, तो रुपये को संभालना एक बेहद खर्चीला और चुनौतीपूर्ण कार्य हो जाता है। उन्होंने इसकी तुलना एक ऐसे तूफान से की जिसमें छाते को संभाल कर रखना मुश्किल होता जा रहा है। पाबारी के अनुसार, निकट भविष्य में 95.30 से 95.50 रुपये की रेंज एक बहुत मजबूत रेजिस्टेंस (रुकावट) के रूप में कार्य करेगी।

मुद्रा बाजार के साथ-साथ इसका असर ऋण बाजार (Debt Market) पर भी स्पष्ट रूप से देखा गया। भारत की सॉवरेन बॉन्ड यील्ड में 5 मई को तीन बेसिस पॉइंट की वृद्धि दर्ज की गई। वहीं, रुपया 22 पैसे की गिरावट के साथ 95.31 पर बंद हुआ, जो कारोबार के दौरान रिकॉर्ड निचले स्तर को छू गया था। ऋण और मुद्रा बाजार में इस बिकवाली की मुख्य वजह होर्मुज जलडमरूमध्य में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता ताजा तनाव ही रहा, जिसने ब्रेंट क्रूड की कीमतों को हवा दी।

बेंचमार्क 10-वर्षीय बॉन्ड की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई, क्योंकि इसकी यील्ड पिछले सत्र के 7.01 प्रतिशत से बढ़कर 7.04 प्रतिशत पर पहुंच गई। वित्त जगत का यह स्थापित नियम है कि बॉन्ड की कीमतें और यील्ड विपरीत दिशा में चलते हैं। ईरान की सैन्य गतिविधियों और यूएई के तेल बंदरगाह में आग लगने के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमतें रातों-रात बढ़कर 114 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गईं, जिसने भारतीय बाजार के लिए खतरे की घंटी बजा दी है।

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