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Internet Addiction: किशोरों में इंटरनेट की लत बनी गंभीर मानसिक बीमारी, विशेषज्ञों की ये चेतावनी उड़ा देगी नींद

Teenagers Social Media Addiction: डिजिटल युग में सोशल मीडिया का बढ़ता उपयोग किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, इंटरनेट की लत से चिंता, नींद में कमी और सामाजिक अलगाव जैसे गंभीर विकार तेजी से बढ़ रहे हैं।
Internet Addiction: किशोरों में इंटरनेट की लत बनी गंभीर मानसिक बीमारी, विशेषज्ञों की ये चेतावनी उड़ा देगी नींद

Internet Addiction in Teens: वर्तमान डिजिटल परिदृश्य में इंटरनेट और सोशल मीडिया किशोरों के जीवन का एक अहम हिस्सा बन चुके हैं। चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो, सामाजिक संपर्क या फिर मनोरंजन, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर निर्भरता तेजी से बढ़ी है। हालांकि, मनोविज्ञान के जानकारों का मानना है कि जब यह उपयोग एक सीमा को पार कर जाता है, तो यह ‘बिहेवियरल एडिक्शन’ (व्यवहारिक लत) में तब्दील हो जाता है। यह स्थिति न केवल किशोरों के वर्तमान को प्रभावित कर रही है, बल्कि उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी दूरगामी और गंभीर प्रहार कर रही है।

मनोविज्ञान की पीएचडी स्कॉलर हिमानी चौधरी के अनुसार, इंटरनेट की यह लत किशोरों में कई मनोवैज्ञानिक विकारों के जोखिम को प्रत्यक्ष रूप से बढ़ा रही है। शोध और जमीनी हकीकत यह बताती है कि इसका सबसे व्यापक प्रभाव ‘एंग्जायटी डिसऑर्डर’ यानी चिंता विकार के रूप में सामने आ रहा है। सोशल मीडिया पर खुद को दूसरों से बेहतर दिखाने की होड़, लगातार ऑनलाइन उपस्थिति बनाए रखने का दबाव और दूसरों की जीवनशैली से अपनी तुलना करना, किशोरों के भीतर एक अनजाना मानसिक तनाव पैदा कर रहा है।

सामाजिक अलगाव और भावनात्मक दूरी ने कमी 
डिजिटल दुनिया की यह चमक-धमक किशोरों को उनके वास्तविक परिवेश से दूर कर रही है। हिमानी चौधरी का तर्क है कि यह प्रवृत्ति ‘सोशल आइसोलेशन’ यानी सामाजिक अलगाव को बढ़ावा देती है। जब किशोर वास्तविक जीवन के रिश्तों और आमने-सामने की बातचीत के बजाय स्क्रीन पर अधिक समय बिताने लगते हैं, तो उनके सामाजिक कौशल (Social Skills) क्षीण होने लगते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि वे अपने परिवार और मित्रों से भावनात्मक रूप से जुड़ने में असमर्थ महसूस करने लगते हैं, जो उनके व्यक्तित्व विकास के लिए एक नकारात्मक संकेत है।

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नींद की कमी और बढ़ते अवसाद का खतरा
इंटरनेट की लत का एक और काला पक्ष नींद के चक्र में होने वाली भारी गड़बड़ी है। रिपोर्ट बताती है कि देर रात तक स्मार्टफोन का उपयोग करने से ‘स्लीप डिस्टर्बेंस’ या ‘इंसोम्निया’ (अनिद्रा) के लक्षण पैदा हो रहे हैं। नींद की यह कमी अगले दिन किशोरों में थकान, अत्यधिक चिड़चिड़ापन और एकाग्रता की कमी का कारण बनती है। लंबे समय तक यदि यह स्थिति बनी रहती है, तो यह ‘डिप्रेसिव सिम्टम्स’ यानी अवसाद के लक्षणों को जन्म देती है, जिससे भावनात्मक अस्थिरता पैदा होती है।

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डॉ. मोहिनी मित्तल की चेतावनी
मनोविज्ञान विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. मोहिनी मित्तल इस समस्या को और अधिक गहराई से देखती हैं। उनके अनुसार, किशोरों में डिजिटल मीडिया का अत्यधिक उपयोग केवल एक बुरी आदत नहीं है, बल्कि यह एक ‘साइकोलॉजिकल रिस्क बिहेवियर’ (मनोवैज्ञानिक जोखिम व्यवहार) का रूप ले चुका है। चूँकि किशोरावस्था में मस्तिष्क विकास की प्रक्रिया में होता है, इसलिए इस उम्र में डिजिटल एडिक्शन का प्रभाव बहुत गहरा और स्थायी हो सकता है।

डॉ. मित्तल का स्पष्ट मत है कि सोशल मीडिया पर स्वीकृति पाने की अपेक्षा और ऑनलाइन पहचान का बोझ किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को खोखला कर रहा है। यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले वर्षों में यह स्थिति भावनात्मक अस्थिरता का भयावह रूप ले सकती है। उनका मानना है कि यह केवल एक व्यक्तिगत समस्या नहीं है, बल्कि यह एक बड़ी पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारी है। यदि आज हम बच्चों की डिजिटल आदतों को नियंत्रित और निर्देशित नहीं कर पाए, तो भविष्य में एक ऐसी पीढ़ी खड़ी होगी जो मानसिक रूप से कमजोर और तनावग्रस्त होगी।

डिजिटल आदतों  से कैसे बचाएं बच्चों का भविष्य?
एक्सपर्ट ने इस मनोवैज्ञानिक संकट से निपटने के लिए विशेषज्ञों ने माता-पिता के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं, जिन्हें अपनाकर इस खतरे को कम किया जा सकता है:

  • स्क्रीन टाइम का निर्धारण: बच्चों के मोबाइल और इंटरनेट उपयोग के लिए एक समय सीमा तय करना अनिवार्य है।
  • खुला संवाद: घर के वातावरण को ऐसा बनाएं जहाँ बच्चे बिना किसी डर के अपनी डिजिटल असुरक्षाओं पर बात कर सकें।
  • मैदानी खेलों पर जोर: आउटडोर गतिविधियों और शारीरिक खेलों को बढ़ावा दें ताकि उनका ध्यान स्क्रीन से हट सके।
  • डिजिटल डिटॉक्स: परिवार के साथ मिलकर सप्ताह में कम से कम एक दिन या कुछ घंटे डिजिटल डिटॉक्स की आदत डालें।
  • भावनात्मक संबल: बच्चों को यह समझाएं कि डिजिटल दुनिया की ‘लाइक्स’ और ‘कमेंट्स’ उनके वास्तविक मूल्य का पैमाना नहीं हैं।

अंततः, इंटरनेट और सोशल मीडिया की लत आज के समय की एक गंभीर सामाजिक चेतावनी है। समाधान केवल प्रतिबंध लगाने में नहीं, बल्कि जागरूकता और संतुलित उपयोग में छिपा है। डॉ. मोहिनी मित्तल और हिमानी चौधरी जैसे विशेषज्ञों का यह विश्लेषण स्पष्ट करता है कि यदि आज सही दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो एक पूरी पीढ़ी को मनोवैज्ञानिक विकारों की गर्त में जाने से रोकना कठिन होगा।

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