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Gully Boy Completes 6 Years: क्यों एक्सेल एंटरटेनमेंट और टाइगर बेबी की ‘गली बॉय’ एक मॉडर्न-क्लासिक है.. जानिए!

Published on: 14 February 2025

Gully Boy Completes 6 Years: एक्सेल एंटरटेनमेंट और टाइगर बेबी की फ़िल्म ‘गली बॉय’, जिसमें रणवीर सिंह और आलिया भट्ट ने मुख्य भूमिकाएँ निभाईं, 2019 में रिलीज़ के समय से ही जबरदस्त सराहना बटोर रही है। 9 फरवरी 2019 को बर्लिन इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में प्रीमियर के बाद, यह फ़िल्म 15 फरवरी 2019 को सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई और इसके संगीत, सिनेमैटोग्राफी, ज़ोया अख्तर के निर्देशन, स्क्रीनप्ले, संवाद और दमदार परफॉर्मेंस के लिए काफी तारीफें मिलीं।

यह 2019 की आठवीं सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली हिंदी फ़िल्म बनी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसे पहचान मिली। इसने बुचोन इंटरनेशनल फैंटास्टिक फ़िल्म फेस्टिवल (दक्षिण कोरिया) में NETPAC अवॉर्ड जीता और भारत की तरफ़ से 92वें ऑस्कर अवॉर्ड्स में ‘बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फ़िल्म’ की आधिकारिक एंट्री के रूप में चुनी गई।

अब जब ‘गली बॉय’ अपने 6 साल पूरे कर चुकी है, तो जानते हैं कि क्यों यह फ़िल्म आज भी एक मॉडर्न-डे क्लासिक मानी जाती है—

जबरदस्त परफॉर्मेंस, जो आज भी यादगार हैं

रणवीर सिंह ने मुराद के किरदार में एक अंडरडॉग के संघर्ष और जुनून को बखूबी जिया, तो वहीं आलिया भट्ट की सफीना ने बॉलीवुड को एक फियरलेस और यादगार फीमेल कैरेक्टर दिया। सिद्धांत चतुर्वेदी ने MC शेर के रूप में तहलका मचा दिया और रातों-रात स्टार बन गए, जबकि विजय वर्मा की शानदार परफॉर्मेंस ने मोईन के किरदार को गहराई दी। अमृता सुभाष (मुराद की माँ) और कल्कि कोचलिन (स्काय) समेत हर कलाकार ने अपने किरदार को असली बना दिया, जिससे ‘गली बॉय’ पूरी तरह रियल और दिल से जुड़ी हुई फ़िल्म लगी।

बेमिसाल कहानी, जिसने अंडरडॉग की जर्नी को नए अंदाज में पेश किया!

ज़ोया अख्तर और रीमा कागती की लिखी इस कहानी ने एक क्लासिक रैग्स-टू-रिचेस कहानी को नए, गहरे और इमोशनल अंदाज में दिखाया। मुराद की सिर्फ़ रैप में सफलता की कहानी नहीं थी बल्कि यह उसकी क्लास स्ट्रगल, पर्सनल लड़ाइयों और खुद को खोजने की यात्रा भी थी। उसकी चुप्पी से लेकर उसके लिरिकल आउटबर्स्ट तक, हर सीन ऑथेंटिक और दिल को छूने वाला था। इसी वजह से ‘गली बॉय’ सिर्फ़ एक म्यूजिक फ़िल्म ही नहीं, एक इमोशनल मास्टरपीस बनी।

दमदार डायलॉग्स और निर्देशन, जिसने कहानी को असरदार बनाया

ज़ोया अख्तर ने मुंबई के अंडरग्राउंड हिप-हॉप कल्चर को पर्दे पर इस तरह उतारा कि शहर खुद फ़िल्म का किरदार बन गया। गलीज़, सड़कों और रैप बैटल्स को इतनी रियलिस्टिक तरीके से दिखाया गया कि हर फ्रेम एनर्जी से भरा हुआ लगा।

विजय मौर्य के लिखे डायलॉग्स तुरंत ही हिट हो गए

सफीना की “मेरे बॉयफ्रेंड से गुलु गुलु करेगी तो धोप्तुंगी ना उसको!

मुराद का “तेरा टाइम आएगा!”

ये डायलॉग्स सिर्फ़ फ़िल्म तक सीमित नहीं रहे, बल्कि पॉप कल्चर का हिस्सा बन गए।

“अपना टाइम आएगा” सिर्फ़ गाना नहीं, बल्कि एक आइकॉनिक मंत्र बन गया

कुछ फ़िल्में ऐसी होती हैं जो सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, बल्कि एक कल्चरल मूवमेंट बन जाती हैं। ‘गली बॉय’ ने ‘अपना टाइम आएगा’ के ज़रिए यही किया।

यह सिर्फ़ एक रैप ट्रैक नहीं था, बल्कि हौसले, संघर्ष और अपने सपनों को सच करने की उम्मीद का मंत्र बन गया। आज भी जब कोई मुश्किल हालातों में जीत की बात करता है, तो यही लाइन दोहराई जाती है—इससे साफ़ है कि ‘गली बॉय’ का असर आज भी बरकरार है।

एक सामाजिक संदेश, जो आज भी प्रासंगिक है!

‘गली बॉय’ सिर्फ़ रैप के बारे में नहीं थी—यह समाज की कड़वी सच्चाई को सामने लाने वाली फ़िल्म थी।

आर्थिक असमानता, क्लास डिवाइड, और हाशिए पर खड़े लोगों के लिए मौके की कमी—इन सभी मुद्दों को यह फ़िल्म बेहद दमदार तरीके से उठाती है। मुराद का सफर सिर्फ़ एक हिप-हॉप स्टार बनने का नहीं था, बल्कि उस सिस्टम से बाहर निकलने का था जो उसे जकड़कर रखना चाहता था। यही कारण है कि ‘गली बॉय’ की कहानी सिर्फ़ 2019 की नहीं थी, बल्कि यह आज भी उतनी ही रिलेटेबल है।

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