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हिमाचल की राजनीति में पहले डिप्टी सीएम बनने जा रहे मुकेश अग्निहोत्री, पहली बार बिहार से शुरू हुई ये परंपरा

हिमाचल की राजनीति में पहले डिप्टी सीएम बनने जा रहे मुकेश अग्निहोत्री, पहली बार बिहार से शुरू हुई ये परंपरा
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प्रजासत्ता ब्यूरो।
हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की जीत के बाद के वरिष्ठ नेता सुखविंदर सिंह सुक्खू को हिमाचल का मुख्यमंत्री तो वहीं भाजपा सरकार के दौरान नेता विपक्ष रहे मुकेश अग्निहोत्री को उप मुख्यमंत्री बनाया जा रहा है। हिमाचल प्रदेश के लिए यह पहला मौका है जब उपमुख्यमंत्री पद किसी दल के नेता को मिला हो। हालांकि इससे पहले भाजपा में उप मुख्यमंत्री बनाएं जाने की चर्चाएं जरूर चली थी लेकिन किसी भी नेता को यह पद नहीं दिया गया। यह पहला मौका है जब हिमाचल को उप मुख्यमंत्री मिला हो।

कहने को राज्य का सर्वेसर्वा मुख्यमंत्री होता है। लेकिन इसके बावजूद उनके अधीनस्थ की पोस्ट कम महत्व की नहीं होती। हालांकि संविधान में उस पद के लिए कुछ नहीं कहा गया है। संविधान में उपमुख्यमंत्री पद को लेकर कोई व्याख्या नहीं की गई है। बल्कि इसे मुख्यमंत्री के बाद दूसरे नंबर का सम्मानजनक पद बना दिया गया है। उपमुख्यमंत्री कभी राजनीतिक हित साधने के लिए बनाया जाता है तो कभी गठबंधन धर्म निभाने के लिए। राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने के लिए कैबिनेट में उपमुख्यमंत्री को रखा जाता है। कई बार तो इनकी संख्या एक से ज्यादा भी होती है।

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गौरतलब है कि डिप्टी सीएम की परंपरा बिहार से ही शुरू हुई थी। आजादी से पहले वर्ष 1937 से 1939 तक डॉ अनुग्रह नारायण सिन्हा बिहार के डिप्टी प्रीमियर थे। इसके बाद वर्ष 1946 से 1957 तक (11 साल 94 दिन) डॉ अनुग्रह नारायण सिन्हा बिहार के डिप्टी सीएम पद पर तैनात रहे। बिहार के बाद राजस्थान और पंजाब (PEPSU) ने सबसे पहले डिप्टी सीएम पद पर नियुक्त की। राज्यस्थान में 1951 से 1952 तक टीका राम पालिवाल उप मुख्यमंत्री रहे। पटियाला एंड ईस्ट पंजाब स्टेट यूनियन (अब पंजाब) में 1951 से 1952 तक ब्रिश भान डिप्टी सीएम पद पर तैनात रहे हैं। इसके बाद ही अन्य राज्यों में भी उप मुख्यमंत्री बनाने की परंपरा शुरू हुई। अब मुकेश अग्निहोत्री के तौर पर हिमाचल प्रदेश को पहली बार उपमुख्यमंत्री मिला है।

बता दें कि उप मुख्यमंत्री का पद संवैधानिक नहीं है। इसलिए इस पद पर नियुक्त होने वाले व्यक्ति को मुख्यमंत्री की संवैधानिक शक्तियां प्राप्त नहीं होती हैं। इन पदों पर तैनात व्यक्ति मुख्यमंत्री की गैर मौजूदगी में मंत्रिमंडल की अगुआई नहीं कर सकता है। इन पदों पर नियुक्त नेताओं को अतिरिक्त भत्ता या अतिरिक्त वेतन नहीं मिलता है। दरअसल ये पद संवैधानिक जरूरतों को पूरा करने के लिये नहीं, बल्कि राजनीतिक तुष्टिकरण के लिए होता है। सत्ताधारी पार्टी राजनीतिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए उप मुख्यमंत्री पद पर किसी को नियुक्त करती है। उप मुख्यमंत्री भी कैबिनेट के अन्य मंत्रियों की तरह ही शपथ लेते हैं। यही वजह है कि बहुत सी सरकार में उप मुख्यमंत्री कोई पद नहीं रहा है।

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