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हिमाचल में भ्रष्टाचार के खात्मे को लेकर गंभीर नही सरकार, ​4 साल से खाली चल रहा लोकायुक्त पद

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प्रजासत्ता|
हिमाचल प्रदेश में लोकायुक्त एक्ट लागू हुए कई वर्ष बीत गए हैं, लेकिन प्रदेश में लोकायुक्त संस्था को सफेद हाथी बन कर रह गई है। क्योंकि वर्तमान जयराम सरकार अब लगभग 4 साल बीत जाने के बाद लोकायुक्त को तैनाती नहीं दे पाई है। गौर हो कि हिमाचल में वर्तमान में लोकायुक्त कार्यालय में लगभग तीन दर्जन अधिकारी व कर्मचारी तैनात बताए जा रहे हैं। लेकिन लोकायुक्त के बगैर इनकी सेवाओं का ज्यादा महत्व नहीं रह जाता है।

हालांकि जयराम सरकार ने लोकायुक्त की तैनाती के लिए विधानसभा के शीतकालीन सत्र में संशोधन विधेयक जरूर लाया है। इसमें प्रावधान किया गया कि मुख्य न्यायाधीश के अलावा हाईकोर्ट के न्यायाधीश को भी लोकायुक्त लगाया जा सकेगा। पुराने कानून के प्रावधानों के अनुसार हिमाचल हाईकोर्ट से रिटायर मुख्य न्यायाधीश या फिर सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की नियुक्ति ही लोकायुक्त पद पर की जा सकती थी।

इसके बाद 5 जनवरी 2020 को लोकायुक्त चयन समिति की शिमला में एक बैठक भी आयोजित की गई। इसमें मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एल नारायण स्वामी, नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्रिहोत्री और विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष राजीव बिंदल ने हिस्सा लिया। इसमें लोकायुक्त की तैनाती को लेकर चर्चा की गई, लेकिन लोकायुक्त आज तक नहीं लगाया जा सका।

उल्लेखनीय है कि पिछली वीरभद्र सरकार के दौरान खाली हुए लोकायुक्त के पद को वर्तमान जयराम सरकार अब लगभग 4 साल बीत जाने के बाद लोकायुक्त को तैनाती नहीं दे पाई है। जबकि हिमाचल हाईकोर्ट भी एक बार लोकायुक्त की तैनाती में देरी को लेकर राज्य सरकार को फटकार लगा चुका है लेकिन अब तक असर नहीं दिखा।

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बता दें कि प्रदेश में सरकार बनाने से पहले चुनावों के दौरान भाजपा ने अपने स्वर्णिम दृष्टिपत्र में सरकार बनते ही लोकायुक्त की नियुक्ति करने का वायदा किया था। सरकार गठन के 4 साल बाद भी पद खाली है। पिछली वीरभद्र सरकार ने लोकायुक्त जस्टिस लोकेश्वर सिंह पांटा के कार्यकाल के पूरा होने के बाद उन्हें एक्सटेंशन देने के लिए कवायद शुरू की थी।

वीरभद्र सरकार ने बाकायदा लोकायुक्त एक्ट में भी संशोधन का प्रयास किया, लेकिन केंद्र सरकार से मंजूरी न मिलने के प्रदेश सरकार शांत हो गई। इसके बाद नए लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर कवायद तो हुई, लेकिन चुनावी मौसम में मामला ठंडे बस्ते में चला गया। इस बीच चुनावों के दौरान भाजपा ने भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के लिए सरकार बनते ही लोकायुक्त की नियुक्ति का वायदा किया, लेकिन 4 साल बीतने के बाद भी इस पद पर सरकार नियुक्त करने की प्रक्रिया भी शुरू नहीं कर सकी।

गौर करने वाली बात यह है कि लोकायुक्त के बगैर प्रदेश में सरकारी नौकरों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतों का निपटारा नहीं हो पा रहा है। क्योंकि लोकायुक्त न होने से लोग अपनी शिकायतें भी नहीं कर पा रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल में पहले ही 55 से अधिक शिकायतें लंबित बताई जा रही है, क्योंकि कानून के मुताबिक इन शिकायतों को खोलने व देखने का अधिकार लोकायुक्त के पास ही है।

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यहाँ हम अपने पाठकों को जानकारी देना चाहते हैं कि नए एक्ट के तहत लोक सेवक से लेकर जनप्रतिनिधि के आलावा भ्रष्टाचार मामलों की जांच हो सकती है। इनमें मुख्यमंत्री,मंत्रियों,विधायकों के अलावा अफसरशाही सहित प्रथम से लेकर चतुर्थ श्रेणी तक के सभी कर्मचारी भ्रष्टाचार के आरोपों की भी जांच हो सकती है।इसके लिए शिकायकर्ता को शपथपत्र देना होगा। अगर यह झूठी पाई गई तो शिकायकर्ता पर भी मामला दर्ज होगा।

कब मिली मंजूरी
30 जून 2015 को राष्ट्रपति ने हिमाचल प्रदेश लोकायुक्त एक्ट-2014 को मंजूरी दी थी। हिमाचल में पहली बार लोकायुक्त एक्ट-1983 में आया। एक्ट में संशोधन के साथ सशक्त बनाने के लिए तत्कालीन भाजपा सरकार ने 2011 में राष्ट्रपति को भेजा, लेकिन मंजूरी नहीं मिली थी। 2012 में प्रदेश में कांग्रेस सत्ता में आई तो बजट सत्र 2013 में संशोधित बिल लाया, जिसे शीतकालीन सत्र धर्मशाला में विपक्ष द्वारा विरोध करने पर वापस लिया गया। फिर 2015 के बजट सत्र में संशोधन के साथ विधानसभा में पास किया, जिस पर 30 जून 2015 को राष्ट्रपति ने मंजूरी दे दी थी।

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