Himachal News Today: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और उनके अधिकारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी बच्चे को सार्वजनिक रूप से ‘चोर’ कहना और उसे जेल भेजने की धमकी देना प्रथमदृष्टया मानसिक पीड़ा पहुंचाने के दायरे में आता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट की रिपोर्ट में मानसिक आघात के संकेत न मिलने मात्र से किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 75 के तहत दर्ज एफआईआर को रद्द नहीं किया जा सकता है। बता दें कि यह सख्त टिप्पणी जस्टिस राकेश कैन्थला की एकल पीठ ने परवाणू स्थित आई-जीनियस स्कूल के एक प्रिंसिपल द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए की।

जिसमे स्कूल के प्रिंसिपल ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर और पुलिस द्वारा दाखिल आरोपपत्र को रद्द करने की मांग करते हुए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। अदालत ने कहा कि बच्चे को वास्तव में कितनी मानसिक पीड़ा हुई या नहीं, यह मुकदमे के दौरान साक्ष्यों के आधार पर ट्रायल कोर्ट तय करेगा।
दरअसल यह पूरा मामला कक्षा सात के एक छात्र से जुड़ा हुआ है। छात्र के पिता द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के अनुसार, स्कूल के प्रिंसिपल ने पूरी कक्षा के सामने उनके बच्चे को सार्वजनिक रूप से ‘चोर’ कहा था। इतना ही नहीं, आरोप है कि प्रिंसिपल ने बच्चे को उम्रकैद देने और जेल भेजने की धमकी भी दी थी। पिता ने आरोप लगाया कि प्रिंसिपल ने बच्चे के पालन-पोषण पर गंभीर सवाल उठाए और उसे स्कूल बदलने तक के लिए मजबूर करने की बात कही।
शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया था कि इस घटना के बाद बच्चे को स्कूल की अन्य सामान्य गतिविधियों से पूरी तरह अलग कर दिया गया। इसके साथ ही छात्र को क्लास के आधिकारिक व्हाट्सएप ग्रुप से भी बाहर निकाल दिया गया, जिससे वह मानसिक रूप से बेहद परेशान हो गया था।
बचाव पक्ष के रूप में प्रिंसिपल ने अदालत में दलील दी थी कि मनोवैज्ञानिक की रिपोर्ट में बच्चे के भीतर किसी भी प्रकार के मानसिक आघात के लक्षण या संकेत नहीं पाए गए हैं। इसलिए, इस मामले में किशोर न्याय अधिनियम की धारा 75 के तहत कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता है और एफआईआर को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाना चाहिए।
हालांकि, हाईकोर्ट ने प्रिंसिपल के इस तर्क को पूरी तरह से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि किसी भी बच्चे को उसके सहपाठियों के सामने चोर कहना और उसे जेल भेजने जैसी धमकियां देना एक ऐसी हरकत है, जो स्वाभाविक रूप से बच्चे को गहरी मानसिक पीड़ा पहुंचा सकती है। मनोवैज्ञानिक की रिपोर्ट अभियोजन पक्ष के मामले को स्वतः ही समाप्त या खारिज नहीं कर देती है। मानसिक प्रताड़ना को मुकदमे के दौरान अन्य साक्ष्यों के माध्यम से भी अदालत में साबित किया जा सकता है।
जस्टिस राकेश कैन्थला ने कानून के तकनीकी पहलुओं को स्पष्ट करते हुए कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत एफआईआर रद्द करने की कार्यवाही में उच्च न्यायालय आरोपों की सत्यता या बचाव पक्ष के साक्ष्यों का मूल्यांकन नहीं कर सकता। चूंकि पुलिस जांच और दस्तावेजों में संज्ञेय अपराध का प्रथमदृष्टया मामला साफ नजर आ रहा है, इसलिए इस पूरे मामले का परीक्षण अब ट्रायल कोर्ट में ही होना चाहिए।


















