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Himachal High Court ने पीड़िता के प्रेम पत्रों को माना भावनाओं का सच्चा इजहार, बलात्कार मामले में बरी होने का फैसला रखा बरकरार

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Himachal High Court: हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी। दरअसल, यह अपील एक ऐसे व्यक्ति को बरी करने के खिलाफ थी, जिस पर एक युवती ने बलात्कार और अपमान जैसे गंभीर आरोप लगाए थे। उल्लेखनीय है कि इस मामले में मुख्य आरोपी मामराज  के 2014 में बरी होने के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा दायर अपील को 29 अगस्त 2025 को न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति सुशील कुक्रेजा की खंडपीठ ने खारिज कर दिया।

इस मामले में आरोपित व्यक्ति पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 504 (अपमान), 506 (आपराधिक धमकी), 376 (बलात्कार) और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1)(xii) के तहत आरोप लगाए गए थे। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट में इस बलात्कार मामले (हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम माम राज) की सुनवाई न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति सुशील कुक्रेजाकी खंडपीठ ने की थी।

कोर्ट ने कहा कि पीड़िता द्वारा आरोपी को लिखे प्रेम पत्र उसकी सच्ची भावनाओं को दिखाते हैं, और इस आधार पर निचली अदालत के बरी करने के फैसले को सही ठहराया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बलात्कार के मामलों में पीड़िता के बयान और सबूतों का विशेष महत्व होता है, लेकिन इस मामले में पीड़िता द्वारा आरोपी को लिखे गए प्रेम पत्रों को उसकी सच्ची भावनाओं का प्रतीक माना जाए।

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क्या है मामला?
जानकारी के मुताबिक मामला वर्ष 2011 का है जब एक युवती ने दावा किया था कि आरोपी मामराज ने उसके साथ जबरदस्ती की और जातिसूचक गालियां दीं और परिवार को धमकाया। उसने यह भी दावा किया कि आरोपी ने पत्रों के जरिये उसे ब्लैकमेल किया और एक बार उसका हाथ पकड़ लिया था, जिसे उसके पति ने छुड़वाया।

लेकिन मामले की जांच में सामने आए प्रेम पत्रों से पता चला कि दोनों के बीच सहमति से संबंध थे। इन पत्रों को कोर्ट ने पीड़िता की सच्ची भावनाओं का सबूत माना। जिसके बाद सितंबर 2014 में नाहन के विशेष न्यायाधीश ने सबूतों की कमी का हवाला देते हुए माम राज को बरी कर दिया।

बाद में राज्य ने बाद में इस फैसले को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 378 के तहत चुनौती दी। लेकिन हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बलात्कार जैसे गंभीर मामलों में पीड़िता की गवाही को प्राथमिकता दी जाती है, लेकिन इस मामले में प्रेम पत्रों ने स्थिति को अलग दिशा दी है।

कोर्ट ने माना कि ये पत्र स्वाभाविक और स्वतंत्र रूप से लिखे गए थे, जो पीड़िता की भावनाओं का शुद्ध प्रतिबिंब थे। इसके आधार पर कोर्ट ने निचली अदालत के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें आरोपी को बरी किया गया था। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह के मामलों में सबूतों का गहन विश्लेषण जरूरी है। पीड़िता के बयानों के साथ-साथ अन्य परिस्थितियों, जैसे प्रेम पत्रों और दोनों पक्षों के बीच संबंधों की प्रकृति, को भी ध्यान में रखा गया।

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आरोपित पर एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत लगाए गए जातिसूचक गालियों के आरोपों की भी अदालत ने बारीकी से जांच की। यहां भी गवाही कमजोर साबित हुई। जिन गवाहों को अभियोजन पक्ष ने पेश किया, उन्हें अदालत ने “स्वार्थी गवाह” माना क्योंकि उनका आरोपी के परिवार के साथ ज़मीन का विवाद चल रहा था। इससे उनके बयानों की विश्वसनीयता पर सवाल उठे।

केस टाइटल : हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम माम राज, फैसला तारीख: 29 अगस्त 2025

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