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Himachal Politics: मंत्री पद या काँटों का ताज…सुधीर के बाद अब राणा का भी मत्री पद लेने से इंकार…

Himachal Politics

प्रजासत्ता ब्यूरो |
Himachal Politics: हिमाचल प्रदेश में सुख की सरकार भले ही आराम से चल रही हो लेकिन अंदर खाते जो सियासी तूफान उमड़ रहे हैं वह प्रदेश में आने वाले दिनों में किसी बड़े सियासी खेला होने के संकेत दे रहे हैं। दरअसल धर्मशाला से विधायक सुधीर शर्मा और सुजानपुर से विधायक राजेन्द्र राणा की अपनी ही सरकार से नाराजगी जग जाहिर है। इनका दर्द रह रह कर मीडिया के माध्यम से सामने आता रहता है।

बीते दिनों सीएम सुक्खू द्वारा धर्मशाला से विधायक सुधीर शर्मा को मंत्री पद देने के संकेत के बाद मीडिया ने जब उनसे कैबिनेट मंत्री बनने को लेकर सवाल किया तो उनका दर्द छलक कर सामने आ गया। उन्होंने कहा कि मुझे मंत्री नहीं बनना और न ही लोकसभा चुनाव लड़ना है। साथ ही उन्होंने कहा, जो लोग सरकार में हैं, उन्हें मौका देना चाहिए। एक बेचारा विधायक जो अपनी चुनाव क्षेत्र तक ही सीमित है, वो कहां लोकसभा का चुनाव लड़ेगा। उन्होंने कहा था कि राज्य सरकार को 14 महीने का वक्त पूरा हो गया है। जब किसी व्यक्ति को भूख लगी होती है, तभी उसे खाना देना जरूरी होता है। उन्होंने सीएम सुक्खू को किसी ओर विधायक को मंत्री बनाने की सलाह दी।

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वहीँ इसके बाद राजेंद्र राणा ने भी अपने निर्वाचन क्षेत्र सुजानपुर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मेरे मतदाताओं ने मुझसे कहा कि आप जहां खड़े होंगे, हम साथ हैं। सुजानपुर विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने आगे कहा कि उनको मंत्रिमंडल में शामिल करने की बात चल रही है। लेकिन सुजानपुर झूठ स्वीकार करने में विश्वास नहीं करती। अब मंत्री बनने का सवाल ही नहीं है। राणा ने यह भी कहा कि हाल ही में मंत्रियों की सूची से उनका नाम हटा दिया गया। समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक राजेंद्र राणा ने कहा कि 14 महीने गुजर गए और कैबिनेट का विस्तार भी हुआ। उन्होंने साफ कहा कि अब हम मंत्री पद स्वीकार नही करेंगे।

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उल्लेखनीय है कि हिमाचल प्रदेश सरकार में केवल मंत्रिपद का एक पद खाली चल रहा है, लेकिन इसे पाने वालों की लिस्ट लंबी है बाबजूद इसके सुधीर शर्मा और राजेंद्र राणा का नाम सबसे ज्यादा सुर्ख़ियों में है लेकिन दोनों ही नेताओं के द्वारा मंत्रिपद न लेने से इंकार करना, यह दर्शाता है कि यह मत्री पद नही बल्कि काँटों का ताज हो। हालांकि सरकार का केवल 14 माह का कार्यकाल ही अभी पूरा हुआ। ऐसे में लगता है कि दोनों नेता अपनी ही सरकार की कार्य प्रणाली से खुश नहीं है।

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