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Himachal Pradesh High Court Maintenance Order: पति की आर्थिक तंगी पत्नी का भरण-पोषण रोकने का आधार नहीं बन सकती – हिमाचल हाईकोर्ट

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पति की बेरोजगारी या खराब कारोबार पत्नी को भरण-पोषण देने की जिम्मेदारी से नहीं बचा सकता। तलाकशुदा पत्नी भी दोबारा शादी न करने तक धारा 125 के तहत हकदार है।
Himachal Pradesh High Court Maintenance Order: पति की आर्थिक तंगी पत्नी का भरण-पोषण रोकने का आधार नहीं बन सकती - हिमाचल हाईकोर्ट

Himachal Pradesh High Court Maintenance Order: हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पति की आर्थिक तंगी, बेरोजगारी, खराब कारोबार या कर्ज चुकाने की जिम्मेदारी पत्नी को भरण-पोषण देने के दायित्व से बचने का आधार नहीं बन सकती। अदालत ने यह भी साफ किया कि तलाकशुदा पत्नी भी दोबारा विवाह न करने तक दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की पूरी हकदार बनी रहती है।

न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान यह अहम टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि पति यह दलील देकर अपनी कानूनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि उसके पास भुगतान करने के पर्याप्त साधन नहीं हैं। पत्नी के भरण-पोषण के कानूनी अधिकार को पति की व्यक्तिगत आर्थिक परेशानियों के कारण समाप्त या प्रभावित नहीं किया जा सकता है।

उल्लेखनीय है कि यह पूरा कानूनी मामला सावित्री देवी और उनके पति सुरजीत से जुड़ा हुआ है। सावित्री देवी की शादी वर्ष 1997 में सुरजीत के साथ हुई थी और दंपति के कुल तीन बच्चे हैं। महिला ने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि विवाह के बाद उसे लगातार शारीरिक और मानसिक क्रूरता का सामना करना पड़ा। इसके परिणामस्वरूप वर्ष 2009 में उसे अपना वैवाहिक घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था।

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घर छोड़ने के बाद महिला ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अंतर्गत अदालत में भरण-पोषण की मांग को लेकर याचिका दाखिल की थी। उसने अदालत को बताया था कि उसके पास अपनी आजीविका चलाने के लिए आय का कोई भी स्वतंत्र स्रोत नहीं है। इसके बाद हमीरपुर की पारिवारिक अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए पति की मासिक आय 11,250 रुपये मानते हुए सावित्री देवी को 4,000 रुपये प्रति माह भरण-पोषण देने का आदेश सुनाया था।

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समय बीतने के बाद वर्ष 2021 में दोनों पक्षों का औपचारिक रूप से तलाक हो गया। इसके बाद पति ने पारिवारिक अदालत के पुराने आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उसने दलील दी कि अब कानूनी रूप से तलाक हो चुका है, इसलिए पत्नी भरण-पोषण की हकदार नहीं है। इसके अलावा उसने अपनी खुद की खराब आर्थिक स्थिति का हवाला भी अदालत के सामने रखा।

हाईकोर्ट ने पति की इन तमाम दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि सिर्फ वैवाहिक संबंध टूटने या तलाक हो जाने मात्र से पत्नी का भरण-पोषण पाने का कानूनी अधिकार समाप्त नहीं होता है। जब तक वह तलाकशुदा महिला दोबारा शादी नहीं करती है, तब तक वह कानून की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की मांग करने के लिए पूरी तरह योग्य है।

अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि केवल अनुमान, अटकल या कोरी धारणा के आधार पर किसी पत्नी को भरण-पोषण के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। इस मामले में पति अपनी पत्नी की पर्याप्त आय साबित करने के लिए अदालत में कोई भी ठोस सबूत पेश करने में विफल रहा। कोर्ट ने दोहराया कि बेरोजगारी या कर्ज जैसी समस्याएं पति को उसकी कानूनी जिम्मेदारी से नहीं बचा सकतीं।

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इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने पारिवारिक अदालत द्वारा तय किए गए 4,000 रुपये प्रति माह के भरण-पोषण को पूरी तरह उचित और न्यायसंगत ठहराया। अदालत ने पति की कमाने की क्षमता और पत्नी की बुनियादी जरूरतों का संतुलन बनाते हुए इस आदेश को बरकरार रखा और पति की पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया।

अंत में उच्च न्यायालय ने पति को निर्देश दिया कि वह आगामी चार सप्ताह के भीतर बकाया भरण-पोषण की पूरी राशि पत्नी को अदा करे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी अन्य कानूनी कार्यवाही के दौरान पत्नी को कोई अन्य राशि प्राप्त हुई है, तो उसका इस भुगतान में समायोजन किया जा सकता है।

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