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HP High Court on JBT Transfer Policy: हिमाचल हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, जेबीटी शिक्षकों के अंतर-जिला तबादला कोटे में कटौती और 15 वर्ष की सेवा का दिया सुझाव

JBT Transfer Verdict: हिमाचल हाईकोर्ट ने जेबीटी शिक्षकों के अंतर-जिला तबादलों पर कड़ी टिप्पणी करते हुए सरकार को कोटा घटाने और न्यूनतम सेवा 15 साल करने का सुझाव दिया है। जस्टिस अजय मोहन गोयल की अदालत ने स्पष्ट किया कि तबादला कोई अधिकार नहीं है।
Published on: 3 April 2026
HP High Court on JBT Transfer Policy: हिमाचल हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, जेबीटी शिक्षकों के अंतर-जिला तबादला कोटे में कटौती और 15 वर्ष की सेवा का दिया सुझाव

HP High Court on JBT Transfer Policy: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने जिला काडर के कर्मचारियों, विशेषकर जूनियर बेसिक टीचरों (JBT) के अंतर-जिला तबादलों (Inter-District Transfer) को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। एक जेबीटी शिक्षक की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने राज्य सरकार को मौजूदा तबादला कोटे में कटौती करने और नियुक्ति वाले जिले में न्यूनतम सेवा अवधि को बढ़ाकर 15 वर्ष करने पर विचार करने के निर्देश दिए हैं।

वर्तमान नियमों के अनुसार, अंतर-जिला तबादला नीति के तहत 5 प्रतिशत कोटा निर्धारित है और पात्रता के लिए संबंधित जिले में कम से कम 5 वर्ष का कार्यकाल अनिवार्य है। न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल ने मामले की प्रारंभिक सुनवाई के बाद महाधिवक्ता को निर्देश दिया कि वे अदालत के इन सुझावों से सरकार को अवगत कराएं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी कर्मचारी के पास अपनी इच्छा से दूसरे जिले में तबादला पाने का कोई निहित अधिकार (Vested Right) नहीं है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने शिक्षकों की प्रवृत्ति पर तीखी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि नियुक्ति के समय शिक्षक सभी शर्तों को स्वीकार करते हैं, लेकिन कुछ समय बीतते ही उनकी ‘तथाकथित’ पारिवारिक कठिनाइयां शुरू हो जाती हैं। इसके बाद वे मनचाहे जिले में स्थानांतरण के लिए प्रयास करते हैं और सफल न होने पर अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं। न्यायालय ने इसे सेवा शर्तों के उल्लंघन की दृष्टि से देखा।

अदालत ने राज्य सरकार की इस दलील से सहमति जताई कि जब किसी कर्मचारी की भर्ती विशिष्ट जिला काडर के पद पर होती है, तो वह उसी जिले में अपनी सेवाएं देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है। खंडपीठ ने दोहराया कि अंतर-जिला तबादलों के अनुरोधों पर विचार करना पूरी तरह से संबंधित प्राधिकरण के विवेकाधिकार पर निर्भर करता है, न कि कर्मचारी की मांग पर।

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