Himachal High Court judgment: हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने पूर्व सैनिक स्वास्थ्य योजना में धोखाधड़ी करने के एक गंभीर मामले में बड़ा आदेश सुनाया है। अदालत ने सेना की मुफ्त स्वास्थ्य सुविधा योजना का गलत इस्तेमाल करने के आरोपी पति के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी और तमाम कानूनी कार्रवाई को पूरी तरह बहाल करने के निर्देश दिए हैं।
हाई कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद अब आरोपी के खिलाफ निचली अदालत में आपराधिक मामला दोबारा शुरू किया जाएगा। बता दें कि यह महत्वपूर्ण फैसला हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के न्यायाधीश संदीप शर्मा की एकल पीठ द्वारा सुनाया गया है।

न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने इस मामले में जिला सत्र न्यायालय के उस पुराने आदेश को सिरे से रद्द कर दिया है, जिसके माध्यम से आरोपी पति को राहत प्रदान की गई थी। इसके साथ ही, उच्च न्यायालय ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए दोनों पक्षों को आगामी 5 अगस्त को संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होने का सख्त आदेश जारी किया है।
दरअसल, पूरी घटना हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के पालमपुर क्षेत्र से जुड़ी है। कानूनी दस्तावेजों के अनुसार, शिकायतकर्ता महिला और आरोपी पति का विवाह साल 1995 में संपन्न हुआ था। शादी के कुछ समय बाद दोनों के बीच वैवाहिक विवाद शुरू हो गया। आपसी मतभेदों और गंभीर विवादों के चलते दोनों पक्षों के बीच चंडीगढ़ की फैमिली कोर्ट में तलाक का एक मुकदमा लंबे समय से लंबित चल रहा है।
इसी वैवाहिक विवाद के बीच, याचिकाकर्ता पत्नी सितंबर 2019 में भारत छोड़कर अमेरिका चली गई थीं और तब से वह लगातार वहीं निवास कर रही हैं। इस मामले में नया मोड़ तब आया जब शिकायतकर्ता पत्नी की अनुपस्थिति का फायदा उठाते हुए पति ने एक बड़ी धोखाधड़ी को अंजाम दिया।
आरोपित के खिलाफ दर्ज शिकायत के मुताबिक, 19 अप्रैल 2021 को आरोपी पति ने पालमपुर स्थित विवेकानंद अस्पताल में एक अन्य अज्ञात महिला को अपनी पत्नी के नाम पर भर्ती करवा दिया। आरोपी ने अपनी पूर्व सैनिक स्वास्थ्य योजना (मुफ्त चिकित्सा सुविधा) का सीधे तौर पर दुरुपयोग किया। उसने इस फर्जीवाड़े के जरिए सरकार को लाखों रुपये के फर्जी मेडिकल बिल भेजे, जिससे सरकार और अपनी वास्तविक पत्नी दोनों के साथ बड़ी धोखाधड़ी की गई।
चूंकि शिकायतकर्ता पत्नी उस दौरान अमेरिका में रह रही थीं, इसलिए उन्होंने भारत में कानूनी पैरवी करने के लिए अपनी सगे बहन को जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी सौंप दी थी। इस अधिकार पत्र के आधार पर शिकायतकर्ता की बहन ने राज्य के पुलिस महानिदेशक और स्थानीय पुलिस प्रशासन के समक्ष मामले की लिखित शिकायत दर्ज कराई।
हालांकि, शुरुआती चरण में स्थानीय पुलिस ने इस गंभीर वित्तीय और आपराधिक जालसाजी को महज एक आपसी वैवाहिक विवाद करार दिया और आरोपी पति के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने से साफ इनकार कर दिया था। पुलिस प्रशासन से न्याय न मिलने के बाद, शिकायतकर्ता ने हार न मानते हुए मजिस्ट्रेट अदालत का दरवाजा खटखटाया।
मजिस्ट्रेट अदालत ने मामले के तथ्यों को गहराई से जांचा और अगस्त 2024 में स्थानीय पुलिस को आरोपी के खिलाफ तुरंत प्रभाव से एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू करने के आदेश जारी किए। मजिस्ट्रेट अदालत के इस फैसले के खिलाफ आरोपी पति ने पालमपुर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के पास पुनर्विचार याचिका दायर की, जहां तकनीकी आधारों पर राहत मिल गई।
मई 2025 में पालमपुर के अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने केवल तकनीकी खामियों को आधार बनाते हुए आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर और पुलिस द्वारा की गई पूरी दंडात्मक कार्रवाई को ही पूरी तरह रद्द कर दिया था। सत्र न्यायालय के इसी विवादास्पद फैसले को वास्तविक पत्नी ने हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी थी। अब हाई कोर्ट ने सत्र न्यायालय के फैसले को पलटते हुए साफ कर दिया है कि ऐसे गंभीर धोखाधड़ी के मामलों में आपराधिक ट्रायल का चलना बेहद जरूरी है।


















