Sugar Price Hike India: देश में चीनी की कीमतों में अचानक हुई तेज वृद्धि ने आम आदमी के साथ-साथ उद्योग जगत की चिंता भी बढ़ा दी है। बीते कुछ दिनों में चीनी के दाम करीब 20 से 25 रुपये प्रति किलो तक बढ़ने से इसका सीधा असर अब एशिया के प्रमुख फार्मा हब बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़ के दवा उद्योग पर भी पड़ने लगा है।
फार्मा उद्यमियों का कहना है कि कई दवाओं और आयुर्वेदिक उत्पादों में चीनी कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल होती है। ऐसे में इसकी कीमतों में अचानक हुई वृद्धि से उत्पादन लागत काफी बढ़ गई है। बीबीएन औद्योगिक क्षेत्र में सिरप, च्यवनप्राश, प्रोटीन पाउडर, नेचुरल जूस, कोल्ड ड्रिंक्स और अन्य उत्पादों के निर्माण में प्रतिदिन बड़ी मात्रा में चीनी का उपयोग किया जाता है।

उद्यमियों के अनुसार, इन उत्पादों की कीमतें पहले से निर्धारित होने के कारण अचानक बढ़ी हुई लागत को उपभोक्ताओं पर डालना आसान नहीं है। वहीं दवाओं की कीमतों में बदलाव की प्रक्रिया सामान्य बाजार उत्पादों की तुलना में अलग और अधिक जटिल होती है। इससे निर्माताओं पर सीधे तौर पर आर्थिक दबाव बन रहा है।
दवा उद्यमियों के अनुसार, इससे पहले त्योहारों के दौरान चीनी की कीमतों में एक-दो रुपये प्रति किलो तक की वृद्धि सामान्य तौर पर देखने को मिलती थी, लेकिन इस बार कुछ ही समय में 20 से 25 रुपये तक की बढ़ोतरी चिंता का विषय बनी हुई है। उनका कहना है कि बाजार में चीनी की उपलब्धता कम होने और कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव से उद्योगों के लिए उत्पादन लागत का सही अनुमान लगाना बेहद मुश्किल हो रहा है।
उल्लेखनीय है कि जून माह में चीनी करीब 42 रुपये प्रति किलो थी, जो अब बढ़कर करीब 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। यह चीनी के दामों में अब तक की सबसे बड़ी बढ़ोतरी मानी जा रही है। दवा उत्पादन में चीनी का काफी उपयोग होता है। इससे पहले प्लास्टिक, एपीआई और एलपीजी की कीमतों में बढ़ोतरी ने उद्योगों की परेशानी बढ़ाई थी, और अब चीनी के दामों में अचानक आए इस उछाल से लागत का दबाव और अधिक बढ़ गया है।
फार्मा और आयुर्वेदिक उद्योग में च्यवनप्राश समेत कई तरह की दवाइयां और सिरप चीनी के इस्तेमाल से ही तैयार होते हैं। यदि कीमतों में इसी तरह अस्थिरता बनी रही और मौजूदा स्टॉक समाप्त हुआ, तो उत्पादन लागत पर सीधा असर पड़ेगा। उद्यमियों का कहना है कि सरकार को चीनी की कीमतों में अचानक होने वाली वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाने चाहिए, ताकि कारोबारियों को इस अनिश्चितता का सामना न करना पड़े। यदि स्थिति पर जल्द नियंत्रण नहीं पाया गया तो आने वाले समय में इसका असर अन्य उपभोक्ता उत्पादों के साथ-साथ गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों पर भी पड़ेगा।
क्यों बढ़ रहे हैं चीनी के दाम.?
भारत में चीनी की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं। थोक बाजार में चीनी का भाव ₹5,500 से ₹5,800 प्रति क्विंटल के सर्वकालिक उच्च स्तर पर है, जबकि खुदरा बाजार में यह ₹60 से ₹65 प्रति किलो तक बिक रही है। इसका मुख्य कारण चीनी का कम स्टॉक, त्योहारी सीजन की भारी मांग और सरकार की एथेनॉल ब्लेंडिंग (E20) नीति है।
पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिश्रण के लक्ष्य को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर गन्ने के रस और शीरे को एथेनॉल उत्पादन में लगाया जा रहा है, जिससे चीनी का कुल उत्पादन घटा है। इसके अलावा, चीनी मिलें आगे और दाम बढ़ने की उम्मीद में सीमित मात्रा में स्टॉक बाजार में जारी कर रही हैं, जिससे तत्काल उपलब्धता कम हो गई है।
एथेनॉल नीति ने भारत के चीनी उद्योग का ढांचा पूरी तरह बदल दिया है। पहले मिलें पूरी तरह चीनी की बिक्री पर निर्भर थीं, लेकिन अब एथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2024-25 में लगभग 19.24% एथेनॉल मिश्रण हासिल कर लिया गया है और 2025-26 तक देश की एथेनॉल उत्पादन क्षमता करीब 1,953 करोड़ लीटर तक पहुंचने का अनुमान है। इससे चीनी मिलों को राजस्व का नया जरिया मिला है, जिससे वे चीनी, एथेनॉल और बिजली से आय अर्जित कर वित्तीय रूप से मजबूत हो रही हैं।
हालांकि, इस नीति का चीनी बाजार पर सीधा प्रभाव पड़ता है। एथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली प्रत्येक टन चीनी घरेलू बाजार में बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं होती। जब देश में चीनी का भंडार पहले से ही सीमित हो, तो गन्ने का डायवर्जन बाजार में आपूर्ति को और घटा देता है। इस तरह एथेनॉल उद्योग के लिए तो विविधीकरण और वित्तीय स्थिरता लेकर आया है, लेकिन इसके कारण बाजार में चीनी की आपूर्ति सीमित होने से कीमतें बढ़ रही हैं।


















