Prevention of Corruption Act: देश की सर्वोच्च अदालत ने सोमवार, 19 जनवरी को अपने एक अहम फैसले में यह स्पष्ट किया कि यदि केंद्र सरकार का कोई कर्मचारी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपराध करता है, तो उस मामले की जांच राज्य की पुलिस एजेंसियां कर सकती हैं। कोर्ट ने कहा कि राज्य पुलिस न सिर्फ मामला दर्ज कर सकती है, बल्कि ऐसे मामलों में आरोप पत्र भी दाखिल कर सकती है।
इसके अलावा सर्वोच्च अदालत ने यह भी साफ किया कि केंद्र सरकार के कर्मचारी के खिलाफ केस दर्ज करने से पहले राज्य पुलिस को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से पूर्व अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। केवल इस आधार पर कि CBI की मंजूरी नहीं ली गई, राज्य एजेंसी द्वारा दाखिल आरोप पत्र को अवैध नहीं माना जा सकता।
एक मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया। दरअसल, राजस्थान हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार के एक कर्मचारी के खिलाफ दर्ज भ्रष्टाचार का मामला रद्द करने से इनकार कर दिया था। हाईकोर्ट ने माना था कि राजस्थान का भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत जांच करने के लिए सक्षम है, भले ही आरोपी केंद्र का कर्मचारी हो।
मामले में दो अहम सवाल उठे थे। पहला, क्या राज्य की सीमा में अपराध होने पर राज्य की एजेंसी जांच कर सकती है या केवल CBI को ही अधिकार है। दूसरा, क्या CBI की अनुमति के बिना दाखिल आरोप पत्र कानूनी रूप से मान्य है। दोनों ही सवाल आरोपी के खिलाफ तय किए गए।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को भी खारिज कर दिया कि केंद्र कर्मचारियों के भ्रष्टाचार मामलों में केवल CBI ही जांच कर सकती है। कोर्ट ने 1973 के ए.सी. शर्मा बनाम दिल्ली प्रशासन के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि CBI कानून का उद्देश्य राज्य पुलिस की शक्तियां छीनना नहीं है।
अदालत ने मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और केरल हाईकोर्ट के फैसलों का भी समर्थन किया, जिनमें कहा गया था कि राज्य में तैनात केंद्र कर्मचारियों के भ्रष्टाचार मामलों की जांच राज्य पुलिस भी कर सकती है। इन्हीं कारणों से सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी।

















