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Himachal Apple Monorail Technology: हिमाचल में चीनी मोनोरेल से सेब परिवहन शुरू, नेपाल के मजदूरों पर घटेगी निर्भरता..! 

Himachal Pradesh Apple Farming: हिमाचल प्रदेश के कोटखाई में सेब की खेती को आसान बनाने के लिए बागवान ने आयातित मोनोरेल तकनीक अपनाई है। मजदूरी की बढ़ती लागत और श्रमिकों की किल्लत से निपटने के लिए उठाया गया यह कदम अब पूरे राज्य में चर्चा का विषय बन गया है।
Updated By Swati Singh
Published on: 11 अक्टूबर 2026
Himachal Apple Monorail Technology: हिमाचल में चीनी मोनोरेल से सेब परिवहन शुरू, नेपाल के मजदूरों पर घटेगी निर्भरता..! 

Himachal Apple Monorail Technology: हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले में स्थित कोटखाई के एक सेब बागवान ने मजदूरों की किल्लत और लगातार बढ़ती मजदूरी की दर से निपटने के लिए आधुनिक तकनीक का सहारा लिया है। कोटखाई निवासी सेब बागवान सुनील चौहान ने अपने सेब के बगीचे से गोदाम तक सेबों को पहुंचाने के लिए पेट्रोल से चलने वाली मोनोरेल प्रणाली स्थापित की है। यह मोनोरेल बगीचे से तोड़े गए सेबों के परिवहन का काम बेहद कुशलता से कर रही है।

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सुनील चौहान द्वारा स्थापित यह मोनोरेल प्रणाली काफी क्षमतावान है और एक बार में भारी वजन उठाने में सक्षम है। चौहान के अनुसार, यह मोनोरेल 500 किलोग्राम तक का वजन उठाकर आसानी से चल सकती है। इसका उपयोग केवल सेब के बक्से और क्रेट्स ले जाने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से खाद, उर्वरक, कृषि उपकरण और खेती से जुड़ी कई अन्य जरूरी सामग्रियां भी बगीचे के एक कोने से दूसरे कोने तक आसानी से पहुंचाई जा रही हैं।

इस पूरी प्रणाली को संचालित करने के लिए सेब के बगीचे में थोड़ी ऊंचाई पर एक विशेष ट्रैक बिछाया गया है। सुनील चौहान ने बताया कि यह मोनोरेल प्रणाली 45 डिग्री तक के कठिन ढलानों पर भी बेहद प्रभावी और सुचारू रूप से काम कर सकती है। वर्तमान समय में वह इस पूरी प्रणाली का ट्रायल रन यानी परीक्षण कर रहे हैं और अब तक के सभी परीक्षण पूरी तरह से सफल और बाधा रहित रहे हैं।

इस अत्याधुनिक मोनोरेल सिस्टम को सुनील चौहान ने विशेष रूप से चीन से आयात किया है। इस पूरी प्रणाली को मंगवाने और स्थापित करने में लगभग 4.20 लाख रुपये की लागत आई है। चौहान का मानना है कि सेब उत्पादन में शारीरिक श्रम के भारी बोझ को कम करने के लिए आने वाले समय में और अधिक तकनीकी समाधानों को तलाशना अनिवार्य हो गया है। वह भविष्य में भी ऐसी ही नई तकनीकों को अपने बगीचे में लागू करने की योजना बना रहे हैं।

अपनी भविष्य की योजनाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि चीन में एक प्रसिद्ध कृषि मेला आयोजित होता है, जहां कृषि क्षेत्र से जुड़ी नवीनतम तकनीकों और आधुनिक उपकरणों का प्रदर्शन किया जाता है। चौहान ने बताया कि वह इस मेले में दोबारा जाने की योजना बना रहे हैं ताकि वहां से अन्य ऐसे उपकरण और प्रौद्योगिकियां देखी और लाई जा सकें, जो पहाड़ी इलाकों में खेती और बागवानी के कामों को और अधिक सुगम तथा सरल बना सकें।

हिमाचल प्रदेश में सेब बागवानी का बड़ा हिस्सा आज भी पारंपरिक और शारीरिक श्रम पर निर्भर है। राज्य के अधिकांश बागवान नेपाल से आने वाले प्रवासी मजदूरों पर अत्यधिक निर्भर हैं। हालांकि, पिछले कुछ समय से मजदूरों की भारी किल्लत और लगातार बढ़ती दिहाड़ी व मजदूरी लागत ने बागवानों की चिंताएं और परिचालन चुनौतियां काफी बढ़ा दी हैं। ऐसे दौर में यंत्रीकरण यानी मशीनीकरण ही इसका एकमात्र स्थायी समाधान नजर आ रहा है।

सुनील चौहान का कहना है कि जब भी वे इटली जैसे विश्व के प्रमुख सेब उत्पादक देशों का दौरा करते हैं, तो वहां की उन्नत प्रणाली देखने को मिलती है। इटली और अन्य यूरोपीय देशों में सेब के बगीचे पूरी तरह से मशीनीकृत हैं। हालांकि, उन देशों में बगीचों का आकार हिमाचल के बगीचों की तुलना में काफी बड़ा होता है, फिर भी वहां का पूरा तंत्र आधुनिक मशीनों के बल पर ही संचालित होता है।

हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य में उबड़-खाबड़ इलाके, विषम भौगोलिक परिस्थितियां और छोटे खेत यंत्रीकरण के रास्ते में सबसे बड़ी बाधाएं माने जाते हैं। इन तमाम चुनौतियों के बावजूद चौहान का दृढ़ विश्वास है कि छोटे-छोटे तकनीकी प्रयास भी बागवानों के दिन-प्रतिदिन के प्रबंधन में एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।

फिलहाल सुनील चौहान ने अपने बगीचे में 100 मीटर लंबा मोनोरेल ट्रैक बिछाया है। उनकी योजना इसे अलग-अलग दिशाओं और विभिन्न स्थानों पर 200 मीटर और आगे बढ़ाने की है। उनका मानना है कि इस प्रणाली के पूरी तरह से चालू हो जाने के बाद नेपाल और अन्य स्थानों से आने वाले मजदूरों पर उनकी निर्भरता काफी हद तक कम हो जाएगी और समय तथा धन दोनों की बचत होगी।

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