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‘स्कूल बंद तो ज़मीन भी आपकी नहीं…’ हिमाचल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, बंद सरकारी स्कूलों की ज़मीन मूल मालिकों को लौटाए सरकार

HP High Court Judgment: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि जिस मकसद के लिए दी गई ज़मीन का अस्तित्व ही खत्म हो जाए, उस पर राज्य सरकार कब्ज़ा बरकरार नहीं रख सकती। कोर्ट ने चार सप्ताह में ज़मीन का कब्ज़ा मालिकों को सौंपने का निर्देश दिया।
Shimla News: 'स्कूल बंद तो ज़मीन भी आपकी नहीं...' हिमाचल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, बंद सरकारी स्कूलों की ज़मीन मूल मालिकों को लौटाए सरका

Shimla News: हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण न्यायिक आदेश पारित करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह शून्य छात्र संख्या के कारण बंद हुए सरकारी प्राइमरी स्कूल की ज़मीन उसके मूल मालिकों को वापस सौंपे। अदालत ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है कि जब जिस विशेष उद्देश्य के लिए भूमि दान या हस्तांतरित की गई थी, वही उद्देश्य समाप्त हो चुका है, तो शिक्षा विभाग या राज्य सरकार उस संपत्ति का कब्ज़ा अपने पास नहीं रख सकती।

उल्लेखनीय है कि यह आदेश उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति ज्योत्सना रेवाल दुआ की पीठ ने रतन सैन बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य नामक एक मामले की सुनवाई के दौरान सुनाया। अदालत ने मामले की परिस्थितियों का विस्तृत अवलोकन करने के उपरांत राज्य सरकार को निर्देश जारी किया है कि वह अगले चार सप्ताह के भीतर संबंधित भूमि का कब्ज़ा याचिकाकर्ता एवं उसके कानूनी वारिसों को सौंपना सुनिश्चित करे।

क्या था पूरा मामला?
प्राप्त तथ्यों के अनुसार, याचिकाकर्ता के दादाजी ने क्षेत्र में शिक्षा के प्रसार और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के कल्याणकारी उद्देश्य से अपनी निजी भूमि राज्य के शिक्षा विभाग को सौंपी थी। इस भूमि पर राज्य सरकार द्वारा एक सरकारी प्राइमरी स्कूल का संचालन प्रारंभ किया गया था। हालांकि, समय बीतने के साथ स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या घटती गई और अंततः स्थिति यह बनी कि वहां छात्रों की संख्या शून्य हो गई।

विद्यार्थियों के अभाव में शिक्षा विभाग को इस सरकारी प्राइमरी स्कूल का संचालन पूरी तरह से बंद करना पड़ा। स्कूल बंद हो जाने के पश्चात भी शिक्षा विभाग ने उस भूमि पर अपना प्रशासनिक कब्ज़ा बरकरार रखा था। भूमि के मूल मालिकों द्वारा संपत्ति वापस मांगे जाने पर जब कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया गया, तब याचिकाकर्ता ने हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस ज्योत्सना रेवाल दुआ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राज्य के शिक्षा विभाग का रुख इस मामले में न्यायसंगत नहीं है। अदालत ने अपने आदेश में दर्ज किया: “प्रतिवादी-राज्य शिक्षा विभाग ने उस मकसद को छोड़ दिया है जिसके लिए याचिकाकर्ता के दादाजी ने अपनी ज़मीन विभाग को दी थी, इसलिए विभाग को ज़मीन अपने पास रखने की इजाज़त नहीं दी जा सकती।”

अदालत ने अपने निर्णय में इस बात पर विशेष बल दिया कि जब सार्वजनिक कल्याण या शिक्षण संस्थान के निर्माण जैसे विशेष उद्देश्य से कोई भूमि दान में अथवा उपयोग हेतु दी जाती है और वह संस्थान ही बंद हो जाता है, तो भूमि रखने का कानूनी एवं नैतिक आधार समाप्त हो जाता है।

चार सप्ताह में कब्ज़ा वापस करने की समय-सीमा
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने मामले की गंभीरता और प्रशासनिक देरी को देखते हुए राज्य सरकार को एक तय समयावधि के भीतर कार्रवाई करने का सख्त निर्देश दिया है। कोर्ट के आदेशानुसार, राज्य सरकार एवं शिक्षा विभाग को चार हफ़्ते के अंदर इस ज़मीन का भौतिक कब्ज़ा उसके मूल मालिकों अथवा उनके कानूनी प्रतिनिधियों को वापस करना होगा।

बता दें कि यह फैसला उन सभी मामलों के लिए एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है, जहां ज़ीरो एनरोलमेंट अथवा अन्य कारणों से बंद पड़े सरकारी संस्थानों के पास निजी दानदाताओं की भूमि अभी भी बिना किसी सक्रिय उपयोग के पड़ी हुई है।

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