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Bahra University - Shimla Hills

बहन से मिलने पहुंची सोलन की अधिष्ठात्री देवी मां शूलिनी

सोलन की अधिष्ठात्री देवी मां शूलिनी

प्रजासत्ता|सोलन
देवभूमि हिमाचल के प्रसिद्ध मेलों में शुमार मां शूलिनी मेला 25 जून यानि शुक्रवार से शुरू हो गया। हालांकि कोरोना महामारी के चलते लगातार दूसरे वर्ष भी इस राज्य स्तरीय मेले को सूक्ष्म रूप में आयोजित किया जा रहा है। मेले के दौरान सोलन की अधिष्ठात्री देवी मां शूलिनी अपने स्थान से पालकी में शहर की परिक्रमा करने निकलती हुई अपनी बड़ी बहन मा दुर्गा से मिलने पहुंचेंगी। शूलिनी मां तीन दिन तक लोगों के दर्शनार्थ वहीं विराजमान रहेंगी। शुक्रवार दोपहर मां शूलिनी की यात्रा शुरू हो गई|

आज पारंपरिक वाद्ययंत्रों व भव्य शोभायात्रा से शुरू होगा मेला
परंपरा के मुताबिक मेले का शुभारंभ मा शूलिनी की भव्य शोभायात्रा से होता आया है लेकिन इस बार सूक्ष्म रूप से मा की पालकी को शहर में घुमाया जाएगा । पारंपरिक वाद्ययंत्रों व लोक धुनों के बीच माता की पालकी को शहर के दुर्गा माता मंदिर में लोगों के दशानार्थ रखा जाएगा । इस दौरान भीड़ इकट्ठी न हो इसको देखते हुए शहर में धारा 144 लागू की गई है।

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बता दें कि देवभूमि के पारंपरिक एवं प्रसिद्ध मेलों में मां शूलिनी मेले का अपना एक अलग ही स्थान है। कोरोना महामारी के बीच यह राज्य स्तरीय मेला 25 से 27 जून तक सूक्ष्म रूप से आयोजित किया जाएगा। इसमें केवल प्राचीन परंपराओं का ही निर्वहन करते हुए दोनों बहनों का मिलन करवाया जाएगा। हालांकि लोग इस वर्ष भी दोनों बहनों के मिलन के दर्शन नहीं कर पाएंगे। मेले का इतिहास बघाट रियासत से जुड़ा हुआ है।

बघाट रियासत के शासकों की कुलदेवी थी मां शूलिनी
मां शूलिनी बघाट रियासत के शासकों की कुल देवी मानी जाती है और मा शूलिनी देवी के नाम से ही सोलन का नामकरण हुआ है। 12 घाटों से मिलकर बनने वाली बघाट रियासत की नींव राजा बिजली देव ने रखी थी। शुरुआत में रियासत की राजधानी जौणाजी हुआ करती थी, उसके बाद कोटी को राजधानी बनाया गया और अंत में इस रियासत की राजधानी सोलन बनी। राजा दुर्गा सिंह इस रियासत के अंतिम शासक थे। रियासत के विभिन्न शासकों के काल से ही माता शूलिनी का मेला आयोजित किया जा रहा है। मान्यता के अनुसार बघाट के शासक अपनी कुल देवी की प्रसन्नता के लिए प्रतिवर्ष मेले का आयोजन करते थे। लोगों का मानना है कि मा शूलिनी के प्रसन्न होने पर क्षेत्र में किसी भी प्रकार की प्राकृतिक आपदा व महांमारी का प्रकोप नहीं होता है बल्कि खुशहाली आती है और मेले की यह परम्परा आज भी कायम है।

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