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Political News: राज्यपालों का अभिभाषण, परंपरा का नया रूप, या मर्यादा का सूक्ष्म परिवर्तन?

Governor's Address: विपक्षी दलों के शासन वाले राज्यों में विधानसभा सत्र के दौरान राज्यपालों द्वारा अभिभाषण पढ़ने की प्रक्रिया में एक उल्लेखनीय बदलाव देखा जा रहा है। अभिभाषण न पढ़ना या कुछ पंक्तियों के बाद उसे अधूरा छोड़ देना एक नई प्रवृत्ति के रूप में उभर रहा है।
Political News: राज्यपालों का अभिभाषण, परंपरा का नया रूप, या मर्यादा का सूक्ष्म परिवर्तन?

Political News: देश के कई राज्यों में इस वर्ष विधानसभा के बजट सत्र की शुरुआत एक असामान्य चुप्पी के साथ हुई। वह परंपरा, जिसे लोकतांत्रिक संवाद का औपचारिक और गरिमापूर्ण प्रारंभ माना जाता था, अब धीरे-धीरे एक प्रतीकात्मक औपचारिकता में बदलती दिख रही है। खासकर केंद्र में बैठी सरकार के विपक्षी दलों द्वारा संचालित राज्यों में राज्यपालों द्वारा अभिभाषण न पढ़ना या कुछ पंक्तियों के बाद उसे अधूरा छोड़ देना एक नई प्रवृत्ति के रूप में उभर रहा है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्यपाल का अभिभाषण केवल शब्दों का वाचन भर नहीं होता, वह राज्य सरकार की नीतियों, प्राथमिकताओं और आगामी वर्ष की दिशा का आधिकारिक प्रस्तुतीकरण होता है। परंतु हाल की घटनाओं ने इस परंपरा के अर्थ और स्वरूप दोनों पर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।

एक कहावत है कि खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है, ठीक उसी तरह राजभवनों में बैठे कुछ सम्माननीय व्यक्तियों का आचरण भी परिवेश के अनुरूप ढलता दिख रहा है। केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में उनकी भूमिका तो स्पष्ट है, लेकिन आजादी के बाद की शुरुआती दशकों में वे इस भूमिका को निभाते हुए कुछ मर्यादा और नैतिक संतुलन बनाए रखते थे। लेकिन अब वह संतुलन कहीं अधिक स्पष्ट रूप से केंद्रित होता प्रतीत होता है।

सबसे हालिया उदाहरण हिमाचल प्रदेश का है। 16 फरवरी 2026 को राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ला ने बजट सत्र के उद्घाटन पर 50 पृष्ठों के अभिभाषण को महज दो मिनट में समेट दिया। उन्होंने पहले दो पैराग्राफ पढ़े और फिर पैराग्राफ 3 से 16 तक को छोड़ दिया, जिसमें 16वें वित्त आयोग के राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) बंद करने के फैसले पर राज्य की चिंता जताई गई थी। राज्यपाल ने स्पष्ट कहा, “मुझे लगता है कि इसमें संवैधानिक संस्था पर टिप्पणियां हैं, जो मुझे नहीं पढ़नी चाहिए।” इसके बाद वे उपलब्धियों वाले हिस्से पर नहीं गए और सदन से आगे बढ़ गए।

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इससे पहले तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि ने विधानसभा के पहले सत्र में अभिभाषण पढ़ने से पूरी तरह इनकार कर दिया। वे सदन में पहुंचे, लेकिन बिना भाषण पढ़े वापस लौट गए। यह पहली बार नहीं था। पिछले कुछ वर्षों में भी ऐसी घटनाएं देखी गईं। उनके अनुरूप ही केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने भी अभिभाषण के कुछ अंशों को छोड़ दिया, जहां केंद्र की नीतियों पर टिप्पणियां थीं। उन्होंने स्वीकृत मसौदे में संशोधन या चयनात्मक पाठ का सहारा लिया।

इसके अलावा कर्नाटक में राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने तो और भी सीधा रुख अपनाया। संयुक्त सत्र में उन्होंने केवल दो-तीन पंक्तियां पढ़ीं और बाकी 11 पैराग्राफों को छोड़कर सदन से बाहर निकल गए। इन पैराग्राफों में केंद्र की आर्थिक नीतियों और मनरेगा जैसे कार्यक्रमों पर राज्य सरकार की चिंताएं व्यक्त की गई थीं। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इसे असंवैधानिक करार दिया, लेकिन परंपरा का यह नया रूप अब चर्चा का विषय बन चुका है।

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संविधान के अनुसार, राज्यपाल द्वारा अभिभाषण सरकार की नीतिगत घोषणा है, न कि व्यक्तिगत मत का प्रकटीकरण। परंतु जब वाचन अधूरा छोड़ दिया जाता है, तो यह संकेत जाता है कि औपचारिकता और असहमति के बीच की रेखा धुंधली हो रही है।

दिलचस्प बात यह भी है कि जिन राज्यों में सत्तारूढ़ दल और केंद्र में सत्तासीन दल एक ही राजनीतिक धारा से जुड़े हैं, वहाँ ऐसी घटनाएँ देखने को नहीं मिलतीं। यानि जहां भाजपा की सरकार है, वहां अभिभाषण को अक्षरशः पढ़ा जाएगा, जबकि भाजपा विरोधी दलों की सरकारों में वहां यही तमाशा जारी रहेगा। इससे स्वाभाविक रूप से यह धारणा मजबूत होती है कि परंपरा का निर्वहन अब राजनीतिक समीकरणों के तराजू पर तौला जा रहा है।

क्यों चिंता का विषय?
संविधान के अनुच्छेद 176 के तहत राज्यपाल को प्रत्येक वर्ष के पहले सत्र में सदन को संबोधित करना होता है। यह अभिभाषण उनकी व्यक्तिगत राय नहीं, बल्कि निर्वाचित सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों का औपचारिक दस्तावेज होता है। संवैधानिक विशेषज्ञों का मत है कि इसमें छेड़छाड़ या चयन का कोई विवेकाधिकार राज्यपाल के पास नहीं है। फिर भी, विपक्षी शासित राज्यों में यह दृश्य बार-बार दोहराया जा रहा है।

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पहले इसे अपवाद माना जाता था। अब यह सामान्य होता जा रहा है। जहां सत्ताधारी दल की सरकारें हैं, वहां अभिभाषण अक्षरशः पढ़ा जा रहा है। लेकिन जहां विपक्ष की सरकारें हैं, वहां यही प्रक्रिया ‘तमाशा’ का रूप ले रही है। राज्यपाल राजनीतिक नियुक्ति होते हैं, यह कोई छिपा सच नहीं। लेकिन पहले वे इस तथ्य को कुछ हद तक ढककर रखते थे। अब लगता है कि वह चोला पूरी तरह उतार दिया गया है।

यह प्रवृत्ति सिर्फ एक प्रक्रिया का उल्लंघन नहीं, बल्कि संघीय ढांचे की भावना पर भी सवाल उठाती है। विपक्षी राज्यों के मुख्यमंत्री इसे केंद्र की ‘प्रतिनिधि नीति’ से जोड़कर देख रहे हैं। चाहे तमिलनाडु हो, केरल, कर्नाटक या हिमाचल, हर जगह एक ही पैटर्न। केंद्र के अनुकूल माहौल में राजभवन की ‘निष्पक्षता’ का रंग थोड़ा और गहरा होता जा रहा है।

क्या यह परंपरा का विकास है या मर्यादा का ह्रास? सवाल उठ रहे हैं, लेकिन जवाब अभी राजभवनों की दीवारों के भीतर ही बंद हैं। लोकतंत्र में संवैधानिक पदों की गरिमा बनाए रखना हर पक्ष का दायित्व है, फिर चाहे वह केंद्र हो या राज्य। वरना यह ‘अभिभाषण’ का तमाशा आगे भी जारी रह सकता है, और लोकतंत्र की मजबूती पर एक और सवालिया निशान लग सकता है।

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