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भ्रष्टाचार के आरोपियों को हाईकोर्ट का बड़ा झटका, अब सिर्फ ‘इस एक चालाकी’ से रद्द नहीं होगी FIR

अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल जांच या चार्जशीट दाखिल करने में हुई देरी के आधार पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज एफआईआर को रद्द नहीं किया जा सकता है।
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Himachal High Court Judgement: भ्रष्टाचार के मामलों पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी रुख अपनाते हुए हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से यह व्यवस्था दी है कि केवल जांच में देरी होने या चार्जशीट दाखिल करने में लंबा समय लगने के आधार पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) के तहत दर्ज की गई एफआईआर (FIR) को रद्द नहीं किया जा सकता है। हाईकोर्ट के इस फैसले से भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे लोगों को केवल प्रक्रियात्मक देरी के आधार पर मिलने वाली राहत पर रोक लग गई है।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह साफ किया है कि यदि कोई आरोपी केवल जांच की लंबी अवधि को आधार बनाकर प्राथमिकी या एफआईआर रद्द करवाना चाहता है, तो उसे अदालत के समक्ष यह ठोस रूप से साबित करना होगा। आरोपी को यह दिखाना होगा कि जांच में हुई इस असाधारण देरी के कारण उसके निष्पक्ष सुनवाई के संवैधानिक अधिकार पर सीधा और गंभीर प्रभाव पड़ा है। इसके साथ ही उसे यह भी प्रमाणित करना होगा कि इस देरी की वजह से उसे वास्तविक रूप से कोई बड़ा कानूनी नुकसान पहुंचा है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह महत्वपूर्ण फैसला हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के माननीय जस्टिस राकेश कैंथला की एकल पीठ ने सुनाया है। अदालत ने यह आदेश ‘राजेश कक्कड़ बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य एवं अन्य’ (Rajesh Kakkar v. State of Himachal Pradesh & Another) नामक मामले की सुनवाई के दौरान दिया। यह पूरा मामला मुख्य रूप से धर्मशाला नगर समिति द्वारा कचरा कंटेनरों की खरीद में बड़े पैमाने पर की गई कथित अनियमितताओं और गड़बड़ियों से जुड़ा हुआ है।

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इस मामले की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो इस संदर्भ में वर्ष 2016 में पहली बार एफआईआर दर्ज की गई थी। इसके बाद मामले की जांच चलती रही और अदालत में अंतिम चार्जशीट दाखिल होने में लगभग आठ वर्ष का एक लंबा समय लग गया। याचिकाकर्ता ने इसी लंबी अवधि को ढाल बनाते हुए अदालत में यह दलील दी थी कि जांच और आरोप पत्र दाखिल करने में हुई यह आठ साल की लंबी देरी सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत प्राप्त उसके त्वरित और निष्पक्ष सुनवाई के मौलिक अधिकार का पूर्ण उल्लंघन है।

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हालांकि, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की इस दलील को पूरी तरह से स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया। अदालत ने इस बिंदु पर विस्तृत टिप्पणी करते हुए कहा कि जांच की प्रक्रिया में इतनी लंबी देरी होना निश्चित रूप से एक चिंताजनक विषय है, लेकिन केवल इसी एक आधार पर यह कतई नहीं माना जा सकता कि आरोपी के मौलिक अधिकारों का हनन हो गया है। कोर्ट के दृष्टिकोण के अनुसार, तकनीकी देरी के अलावा वास्तविक नुकसान का होना जरूरी है।

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में आगे स्पष्ट किया कि यह साबित करना अनिवार्य है कि इस देरी के कारण आरोपी का अपना कानूनी बचाव कमजोर पड़ गया है, मामले से जुड़े महत्वपूर्ण साक्ष्य पूरी तरह नष्ट हो गए हैं या फिर जरूरी गवाह अब उपलब्ध नहीं रहे हैं। अदालत का मानना है कि यदि याचिकाकर्ता ऐसा कोई भी ठोस और वास्तविक नुकसान साबित करने में पूरी तरह विफल रहता है, तो भ्रष्टाचार जैसे अत्यंत गंभीर मामलों को केवल तकनीकी और प्रक्रियात्मक देरी के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता है।

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इसके साथ ही हाईकोर्ट ने इस बात पर भी विशेष जोर दिया कि भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में बहुत व्यापक जनहित शामिल होता है। ऐसे गंभीर मामलों को सिर्फ प्रशासनिक या जांच प्रक्रिया में हुई देरी के कारण बीच में ही समाप्त कर देना न्याय के वास्तविक उद्देश्य के बिल्कुल विपरीत होगा। उल्लेखनीय है कि इस मामले की जांच के दौरान कचरा कंटेनरों की खरीद प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं, ई-टेंडरिंग के निर्धारित नियमों के उल्लंघन और फर्जी कोटेशन जमा करने जैसे कई गंभीर आरोप सामने आए थे, जिनके आधार पर आईपीसी (IPC) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आरोप पत्र दायर किया गया है।

अंत में, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया। कोर्ट ने एक बार फिर साफ किया कि सिर्फ जांच में देरी होना एफआईआर रद्द करने का वैध आधार नहीं बन सकता, जब तक आरोपी निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित होने की बात साबित न करे। इसके साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस आदेश में की गई किसी भी प्रकार की टिप्पणियां इस मामले के अंतिम निर्णय या ट्रायल को किसी भी रूप में प्रभावित नहीं करेंगी।

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