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हिमाचल हाईकोर्ट ने 12 साल तक फरार दुष्कर्म के दोषी को राहत से किया इनकार, सजा निलंबन याचिका खारिज

Himachal Pradesh High Court: शिमला की फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट द्वारा 10 साल के कठोर कारावास की सजा पाए दोषी प्रीत सिंह की अर्जी को हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए सिरे से खारिज कर दिया है।
Published on: 8 July 2026
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HP High Court Rape Case Verdict: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने दुष्कर्म और आपराधिक धमकी के मामले में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की सजा को निलंबित करने की याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। अदालत ने मामले पर सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि मुकदमे के दौरान 12 साल तक फरार रहने वाले और कानून की प्रक्रिया से बचने वाले अपराधी को किसी भी तरह की राहत नहीं दी जा सकती।

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई के बाद अपना फैसला सुनाया। खंडपीठ ने कानूनी सिद्धांतों को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि कम अवधि की सजा वाले मामलों में सजा का निलंबन एक सामान्य नियम हो सकता है, लेकिन दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराधों में दोषी ठहराए जाने के बाद सजा को निलंबित करना केवल एक अपवाद होना चाहिए, न कि कोई सामान्य नियम।

अदालत ने यह सख्त आदेश दोषी प्रीत सिंह की ओर से दायर की गई अर्जी पर सुनवाई के बाद जारी किया। दरअसल, यह पूरा मामला वर्ष 2006 में शिमला जिले के पुलिस थाना रोहड़ू में दर्ज की गई एक प्राथमिकी से संबंधित है। घटना के तुरंत बाद पीड़ित महिला ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी, जिसके आधार पर कानूनन कार्रवाई शुरू की गई थी।

इस मामले पर लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट शिमला ने 17 फरवरी 2025 को अपना फैसला सुनाया था। विशेष अदालत ने आरोपी प्रीत सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत दुष्कर्म का दोषी पाते हुए 10 साल के कठोर कारावास और 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके साथ ही, आरोपी को धारा 506 के तहत आपराधिक धमकी देने के लिए दो साल के साधारण कारावास की सजा भी सुनाई गई थी।

फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए जाने और सजा सुनाए जाने के बाद, प्रीत सिंह ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। अपील के साथ ही उसने एक अर्जी दाखिल कर अपनी सजा को निलंबित करने की मांग की थी, ताकि उसे जेल से बाहर आने की राहत मिल सके।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से इस याचिका का कड़ा विरोध किया गया। सरकारी वकील ने अदालत के सामने आरोपी के पिछले आचरण का पूरा ब्यौरा प्रस्तुत किया। अदालत को बताया गया कि घटना के बाद आरोपी को 24 मार्च 2006 को गिरफ्तार कर लिया गया था, लेकिन वह पुलिस हिरासत के दौरान सुरक्षाकर्मियों को चकमा देकर भागने में सफल रहा।

इसके बाद आरोपी अगले 12 वर्षों तक लगातार पुलिस की गिरफ्त से बाहर रहा और फरार चलता रहा। लंबी तलाश के बाद पुलिस उसे 27 फरवरी 2018 को दोबारा गिरफ्तार करने में कामयाब हो सकी थी। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के तर्कों और कानून से भागने के आरोपी के इतिहास को देखते हुए उसकी याचिका में कोई भी दम नहीं पाया और उसे जेल में ही रखने का आदेश दिया।

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