DSP Vijay Raghuvanshi Case: हिमाचल प्रदेश पुलिस विभाग में तैनात डीएसपी विजय रघुवंशी के साथ हुए कथित जातिगत भेदभाव और प्रशासनिक उत्पीड़न के मामले ने तूल पकड़ लिया है। इस पूरे प्रकरण पर राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) ने बेहद कड़ा संज्ञान लिया है। आयोग ने राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) अशोक तिवारी को नई दिल्ली स्थित मुख्यालय में अद्यतन रिपोर्ट के साथ व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का स्पष्ट निर्देश जारी किया है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए आयोग ने सुनवाई की तारीख निर्धारित की थी और डीजीपी को केस से संबंधित सभी मूल फाइलों, केस डायरी और अब तक की गई कार्रवाई रिपोर्ट सहित आवश्यक अभिलेख प्रस्तुत करने का आदेश दिया था। सूत्रों के मुताबिक इसके जवाब में डीजीपी अशोक तिवारी ने आगामी 20 अगस्त को होने वाली सुनवाई में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से शामिल होने की अनुमति मांगी थी।

डीजीपी ने आयोग के समक्ष दिए गए अपने आवेदन में हिमाचल प्रदेश विधानसभा के चालू मानसून सत्र और राज्य में कानून-व्यवस्था व सुरक्षा संबंधी प्रशासनिक व्यस्तताओं का हवाला दिया था। हालांकि, आयोग ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। सूत्रों से मिली अंतिम जानकारी के अनुसार, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने डीजीपी के इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज करते हुए उन्हें व्यक्तिगत रूप से ही आयोग के सामने पेश होने का अंतिम निर्देश दिया है।
आयोग का मानना है कि अत्याचारपूर्ण कृत्य से जुड़ा यह मामला अत्यंत गंभीर प्रकृति का है। शिकायत में दर्ज कराए गए आरोपों और वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए कथित उत्पीड़न को किसी भी स्थिति में लगातार जारी रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इस प्रकार के गंभीर आरोपों का निष्पक्ष, स्वतंत्र और प्रभावी परीक्षण होना अत्यंत आवश्यक है ताकि न्याय सुनिश्चित किया जा सके।
बता दें कि पीड़ित डीएसपी विजय रघुवंशी द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत में कई चौंकाने वाले और गंभीर बिंदु उठाए गए हैं। शिकायत के अनुसार, बिना किसी ठोस या पर्याप्त कानूनी आधार के उनके आधिकारिक उपयोग में शामिल सरकारी वाहन को वापस ले लिया गया अथवा जबरन छीन लिया गया। इसके अलावा, अधिकारी की रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट और असहनीय शारीरिक पीड़ा की प्रमाणित चिकित्सीय स्थिति होने के बावजूद, उन्हें जानबूझकर अत्यंत दूरस्थ और कठिन भौगोलिक क्षेत्र में तैनात किया गया, जिससे उनका स्वास्थ्य और अधिक बिगड़ गया।
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि अधिकारी को प्रशासनिक रूप से प्रताड़ित करने के उद्देश्य से उनके विरुद्ध निलंबन और विभागीय जांच शुरू करने के प्रस्तावों को चुनिंदा रूप से बार-बार आगे बढ़ाया गया। इतना ही नहीं, शिकायतकर्ता का दावा है कि उनके पक्ष में गवाही देने वाले या उनकी शिकायतों से जुड़े महत्वपूर्ण गवाहों को भी लगातार डराया, धमकाया और निशाना बनाया गया। संबंधित गवाहों को संस्थागत रूप से बदनाम करने और प्रताड़ित करने के संगठित प्रयास किए गए।
कार्यालय के आंतरिक माहौल को लेकर शिकायत में बेहद संगीन आरोप लगाए गए हैं। इसके मुताबिक, कार्यालय परिसर के भीतर ऐसा भयग्रस्त वातावरण तैयार किया गया जिससे डीएसपी को प्रशासनिक रूप से पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया जाए। स्थिति यह बना दी गई थी कि जो भी अन्य अधिकारी या कर्मचारी उनसे मिलते थे या सामान्य बातचीत भी करते थे, उन्हें सीधे विभागीय कार्रवाई की धमकियां दी जाती थीं।
राज्य के पुलिस महकमे में वरिष्ठ स्तर पर हुए इस प्रकार के कथित भेदभाव और उत्पीड़न के बीच राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग का यह सीधा और सख्त हस्तक्षेप बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आयोग के इस कड़े रुख से मामले में त्वरित और निष्पक्ष जांच की उम्मीद बढ़ गई है।


















