What is Circle Rate: घर खरीदते समय ज्यादातर लोग लोकेशन, कीमत और बजट पर पूरा ध्यान देते हैं। लेकिन, एक ऐसी महत्वपूर्ण चीज है जिसे अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं, और वह है सर्किल रेट। सर्किल रेट एक ऐसा महत्वपूर्ण आंकड़ा है जो यह तय करता है कि आपकी प्रॉपर्टी पर कितना टैक्स लगेगा और रजिस्ट्रेशन में कितना खर्च आएगा। इसके अलावा, यह इस बात को भी तय करता है कि आपको बैंक से कितना होम लोन प्राप्त हो सकेगा।
दिलचस्प बात यह है कि भले ही आप किसी प्रॉपर्टी को कम कीमत पर खरीदने की डील करें, लेकिन सरकार हमेशा सर्किल रेट के आधार पर ही उसकी वैल्यू को स्वीकार करती है। ऐसे में सर्किल रेट को समझे बिना प्रॉपर्टी खरीदना मतलब अधूरी जानकारी के साथ कोई बड़ा आर्थिक फैसला लेना है। इसीलिए, किसी भी प्रॉपर्टी सौदे से पहले इसकी पूरी जानकारी होना अनिवार्य माना जाता है।
बता दें कि सर्किल रेट वह न्यूनतम कीमत होती है, जिसे राज्य सरकार किसी विशेष इलाके में प्रॉपर्टी की खरीद-बिक्री के रजिस्ट्रेशन के लिए तय करती है। इसे रेडी रेकनर रेट के नाम से भी जाना जाता है। प्रॉपर्टी की रजिस्ट्रेशन फीस और स्टांप ड्यूटी इसी निर्धारित रेट के आधार पर तय की जाती है। आमतौर पर राज्य का राजस्व विभाग सर्किल रेट को हर साल या दो-तीन साल में अपडेट करता है, ताकि यह मौजूदा बाजार के हिसाब से सटीक बना रहे।
सर्किल रेट को तय करते समय सरकार कई महत्वपूर्ण चीजों को ध्यान में रखती है। इसमें लोकेशन सबसे बड़ा फैक्टर होता है। जिन इलाकों में बेहतर कनेक्टिविटी, अच्छी सड़कें और बुनियादी ढांचा यानी इंफ्रास्ट्रक्चर होता है, वहां सर्किल रेट अधिक होता है। इसके अलावा, प्रॉपर्टी का प्रकार भी बहुत मायने रखता है। रेजिडेंशियल, कमर्शियल और इंडस्ट्रियल प्रॉपर्टी के लिए सरकार द्वारा अलग-अलग रेट तय किए जाते हैं। वहीं जिन इलाकों में जमीन खरीद बिक्री बढती है तो वहां का सर्किल रेट भी बढ़ता है।
उल्लेखनीय है कि ओनरशिप यानी फ्रीहोल्ड और लीजहोल्ड प्रॉपर्टी के मामले में भी रेट अलग-अलग हो सकते हैं। इसके अलावा, आसपास की सुविधाएं जैसे कि अस्पताल, स्कूल और बाजार की उपलब्धता भी सर्किल रेट को प्रभावित करती है। प्रॉपर्टी का आकार और उसकी उम्र भी एक अहम भूमिका निभाते हैं। छोटी या पुरानी प्रॉपर्टी का रेट अलग हो सकता है।
सर्किल रेट को समय-समय पर इसलिए बदला जाता है ताकि यह रियल एस्टेट बाजार की सही तस्वीर को दर्शा सके। जिन क्षेत्रों में मांग यानी डिमांड ज्यादा होती है, वहां रेट बढ़ जाता है और जहां मांग कम होती है, वहां रेट कम रहता है। इसका एक अन्य बड़ा मकसद यह भी होता है कि खरीदार और विक्रेता कम कीमत दिखाकर स्टांप ड्यूटी बचाने की कोशिश न कर सकें। इससे सरकार को उचित राजस्व प्राप्त हो पाता है।
अब एक उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। मान लीजिए किसी प्रॉपर्टी की बाजार कीमत 50 करोड़ रुपये है, लेकिन सर्किल रेट के हिसाब से उसकी वैल्यू 1 करोड़ रुपये तय होती है। ऐसे में टैक्स और स्टांप ड्यूटी 1 करोड़ रुपये के आधार पर ही देय होगी। इससे यह सुनिश्चित होता है कि लेन-देन में वास्तविक मूल्य छिपाया न जाए और सरकार को सही कर प्राप्त हो सके।
आपको जानकारी देते हैं कि प्रॉपर्टी खरीदते समय सर्किल रेट की जानकारी होना बहुत जरूरी है। क्योंकि कुल खर्च केवल प्रॉपर्टी की कीमत तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसमें स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन फीस भी शामिल होती है। यह राशि सर्किल रेट या डील वैल्यू में से जो भी अधिक हो, उसके आधार पर तय की जाती है। इसके जरिए आप यह भी समझ सकते हैं कि प्रॉपर्टी की कीमत सही है या अधिक अथवा कम है।
गौरतलब है कि सर्किल रेट का सीधा और महत्वपूर्ण असर आपके होम लोन पर भी पड़ता है। बैंक आमतौर पर सर्किल रेट से तय वैल्यू और वास्तविक कीमत में जो कम होती है, उसी के आधार पर होम लोन की राशि तय करते हैं। यदि किसी इलाके का सर्किल रेट कम है, तो आपकी होम लोन पात्रता भी कम हो सकती है।
इसका सीधा अर्थ यह है कि ऐसी स्थिति में आपको अपनी तरफ से ज्यादा डाउन पेमेंट करना पड़ सकता है। इसके साथ ही, बैंक और अन्य वित्तीय संस्थाएं भी इसी आधार पर प्रॉपर्टी की वैल्यू का आकलन करती हैं। इसलिए प्रॉपर्टी खरीदने से पहले सर्किल रेट को समझना आवश्यक है, ताकि आप अपना सही बजट और वित्तीय योजना तैयार कर सकें।
















