Himachal News: हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने शिमला बाईपास परियोजना के निर्माण निर्णयों को लेकर भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने प्राधिकरण से पूछा है कि मूल सतही राजमार्ग योजना को दरकिनार कर जुड़वां सुरंग परियोजना का विकल्प चुनने की आवश्यकता क्यों पड़ी। यह मामला तब गंभीर रूप धारण कर चुका है जब प्राधिकरण इस संरेखण के तहत भूमि अधिग्रहण और शुरुआती मुआवजे के रूप में लगभग ₹600 करोड़ की राशि पहले ही वितरित कर चुका है।
न्यायमूर्ति संदीप शर्मा की पीठ ने संजौली क्षेत्र के प्रभावित निवासियों द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिए हैं। अदालत ने केंद्र सरकार, हिमाचल प्रदेश सरकार, एनएचएआई और शिमला के उपायुक्त सहित सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। इस मामले की अगली आधिकारिक सुनवाई 17 नवंबर को निर्धारित की गई है।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष शिमला बाईपास के पैकेज नंबर 2 के अंतर्गत चलाउठी-संजौली-भट्टा कुफर जुड़वां-ट्यूब सुरंग के निर्माण कार्य पर तुरंत रोक लगाने की मांग की है। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि सुरंग निर्माण के लिए की जा रही खुदाई और ड्रिलिंग गतिविधियों के कारण निर्माण स्थल के ठीक ऊपर स्थित आवासीय भवनों को गंभीर संरचनात्मक क्षति पहुंच रही है।
सुरक्षा रिपोर्ट तक निर्माण कार्य पर स्थगन
अदालत में सुनवाई के दौरान एनएचएआई के कानूनी प्रतिनिधि ने सूचित किया कि क्षेत्र में सुरंग से संबंधित सभी निर्माण कार्य 18 सितंबर से निलंबित कर दिए गए हैं। प्राधिकरण के अनुसार, यह काम तब तक फिर से शुरू नहीं किया जाएगा जब तक कि आईआईटी रुड़की (IIT Roorkee) की विशेषज्ञ टीम अपनी अंतिम सुरक्षा आकलन रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं कर देती। उच्च न्यायालय ने इस वक्तव्य को रिकॉर्ड पर लेते हुए भरोसा जताया कि अगली सुनवाई तक कोई नई निर्माण गतिविधि नहीं होगी, यद्यपि अदालत ने इस चरण में कोई औपचारिक निषेधाज्ञा जारी करने से परहेज किया।
₹600 करोड़ के सार्वजनिक धन पर अदालत का सवाल
उच्च न्यायालय द्वारा इस पूरी परियोजना में उठाई गई सबसे प्रमुख चिंताओं में से एक यह है कि जब भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी और भारी मुआवजा बांटा जा चुका था, तब मूल सतही राजमार्ग योजना को अचानक क्यों त्याग दिया गया। अदालत ने मुआवजे के तौर पर वितरित किए गए ₹600 करोड़ के सार्वजनिक व्यय पर एनएचएआई से जवाब मांगा है और पूछा है कि इस भारी भरकम सरकारी खर्च की भरपाई कौन करेगा।
जीएसआई की चेतावनी दरकिनार करने का आरोप
स्थानीय निवासियों, जिन्हें मूल संरेखण योजना के समय विस्थापित किया गया था, ने अदालत को अवगत कराया कि भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) ने इस क्षेत्र की भूवैज्ञानिक अस्थिरता और ऊपर घनी आबादी वाले आवासीय ढांचे होने के कारण सुरंग निर्माण न करने की सलाह दी थी। निवासियों का आरोप है कि एनएचएआई ने जीएसआई की इस भूवैज्ञानिक चेतावनी को नजरअंदाज करते हुए काम आगे बढ़ाया, जिसके परिणामस्वरूप संजौली और भट्टा कुफर जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में घरों में दरारें आ गईं। इस स्थिति से वर्तमान में लगभग 1,000 परिवारों की सुरक्षा पर सीधा संकट खड़ा हो गया है।




















