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पंजाब में प्रचंड जीत के बाद हिमाचल में भाजपा-कांग्रेस के कई नेता झाड़ू थामने को तैयार

पंजाब में प्रचंड जीत के बाद हिमाचल में भाजपा-कांग्रेस के कई नेता झाड़ू थामने को तैयार

प्रजासत्ता|
पंजाब के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की बंपर जीत ने हिमाचल प्रदेश के कार्यकर्ताओं में जोश भर दिया है। प्रदेश की अन्य जगहों के साथ राजधानी शिमला में जश्न कर आप ने यह संदेश दिया कि अब हिमाचल में झाड़ू अपनी ताकत दिखाने के लिए तैयारी में जुट गया है। आप का पहला लक्ष्य मई-जून में होने वाले शिमला नगर निगम चुनाव है। उसके बाद इसी साल होने वाले विधानसभा चुनाव में एंट्री की तैयारी है।

वहीँ सियासी गलियारों में चर्चाएं चल रही हैं भाजपा और कांग्रेस के कुछ दिग्गजों समेत छोटे-बड़े कई नेता झाड़ू थामने के लिए तैयार हैं। इससे भाजपा और कांग्रेस दोनों अच्छी तरह से वाकिफ हैं लेकिन कैमरे के सामने सीधे पर तौर आम आदमी पार्टी की चुनौती को खारिज कर रहे हैं। सतारूढ़ भाजपा सत्ता वापसी के लिए जोर लगा रही, वहीँ कांग्रेस आप की इस जीत से चिंता में पड़ गई हैं। दोनों ही दलों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। हालांकि इसमें भी दो राय नही है कि हिमाचल की अब तक की सियासत में तीसरा विकल्प कोई खास असर दिखा नहीं पाया है।

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खबरें की माने तो वर्तमान सरकार के मंत्रियों के अलावा कई पूर्व मंत्री, सत्ता पक्ष और विपक्ष के कुछ विधायकों के साथ आम आदमी पार्टी संपर्क साधने की कोशिश कर रही है। कुछ इनमें से ऐसे बताए जा रहे हैं कि जो खुद संपर्क कर रहे हैं। इनमें से ज्यादातर वो हैं जिन्हें आने वाले विधानसभा चुनावों में टिकट कटने का डर सता रहा है और इन नेताओं में वो असंतुष्ट भी शामिल हैं जिन्हें पिछले चुनावों में टिकट नहीं मिला और इस बार भी उम्मीदें कम ही हैं। खबरों के अनुसार कुछ नेताओं ने तो दिल्ली में पार्टी कार्यालय में हाजिरी भी भरी है और कुछ लोग पार्टी से जुड़ने से पहले आप प्रमुख अरविंद केजरीवाल से सीधी बातचीत चाहते हैं।

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आम आदमी पार्टी के हिमाचल प्रभारी रत्नेश गुप्ता के अनुसार पार्टी प्रदेश की सभी 68 सीटों पर आने वाले विधानसभा चुनावों में पूरी ताकत से चुनाव लड़ेगी। साथ ही उनका कहना है कि कांग्रेस और भाजपा के बहुत से नेता पार्टी के संपर्क में हैं। उनका कहना है कि जो लोग सही मायनों में जनता की सेवा करना चाहते हैं और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ना चाहते हैं, वो पार्टी में शामिल होंगे।

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वहीँ अगर कांग्रेस की बात करें तो लंबे समय तक कांग्रेस का प्रदेश में चेहरा रहे दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के बिना विधानसभा चुनाव होगा। पार्टी कई गुटों में बंटी है, मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर पहले ही शीत युद्ध छिड़ा हुआ है। संगठन की सरदारी कब्जाने के लिए भी कई नेताओं ने हाईकमान के पास अपनी गोटियां फिट की हुई हैं।

उधर भाजपा भी प्रदेश में कई गुटों में बंटी हुई हैं। उपचुनाव में बड़े स्तर पर यह बात सामने आ चुकी है। भितरघात को रोक पाना सबसे बड़ी चुनौती है। एंटी इनकमबेंसी फैक्टर को भी रोकना होगा। आप की भाजपा के कई प्रभावशाली चेहरों पर नजर हैं। सभी को पार्टी से जोडे रख पाना मुश्किल है।

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