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“राम मंदिर में चोरी पर जिसे फर्क न पड़ा, उसे क्या शर्म आएगी!”- बुलडोजर और भ्रष्टाचार पर Allahabad High Court जज की तल्ख टिप्पणी,

Allahabad High Court Bulldozer Action and Ram Mandir Donation Theft Issue: बुलडोजर न्याय से लेकर राम मंदिर चढ़ावा चोरी तक, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सरकारी रवैये और प्रशासनिक भ्रष्टाचार पर तीखे सवाल खड़े करते हुए कड़े कदमों की वकालत की है।
"राम मंदिर में चोरी पर जिसे फर्क न पड़ा, उसे क्या शर्म आएगी!"- बुलडोजर और भ्रष्टाचार पर Allahabad High Court जज की तल्ख टिप्पणी,

Allahabad High Court: उत्तर प्रदेश में इन दिनों शासन के दो प्रमुख पहलू चर्चा के केंद्र में बने हुए हैं। एक ओर जहां राज्य सरकार द्वारा की जाने वाली बुलडोजर कार्रवाई लगातार सुर्खियों में है, वहीं दूसरी ओर अयोध्या के भव्य राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का मामला भी जोर पकड़ रहा है। इन दोनों ही गंभीर विषयों पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस अतुल श्रीधरन ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए प्रशासनिक व्यवस्था और न्यायिक मर्यादा पर विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है।

जस्टिस अतुल श्रीधरन ने बुलडोजर ऐक्शन की शैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी भी अपराध के घटित होने के तुरंत बाद आरोपी का घर गिरा देने जैसी कार्रवाई ‘बुलडोजर न्याय के आहार पर पले-बढ़े समाज की कथित खूनी प्यास को संतुष्ट करने के लिए’ की जाती है। उन्होंने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस संबंध में स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए जाने के बावजूद बिना किसी डर के ऐसी कार्रवाइयों का सिलसिला अनवरत जारी है।

अदालत की इस टिप्पणी से यह संकेत मिलता है कि देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा बनाए गए कानूनों और आदेशों का पालन कराने में राज्य सरकारें असहज दिख रही हैं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे अधिकारियों को यह पूर्ण विश्वास है कि सर्वोच्च अदालत के फैसलों का उल्लंघन करने के बाद भी उन्हें किसी बड़े नुकसान का सामना नहीं करना पड़ेगा। यह स्थिति कानून के शासन और न्यायिक व्यवस्था की गरिमा पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, गैरकानूनी निर्माणों और उन पर चलने वाले बुलडोजर ऐक्शन पर सवाल उठाते हुए कोर्ट ने पूछा कि आखिर ये अवैध संरचनाएं अस्तित्व में आती ही कैसे हैं? कोई भी आवासीय मकान रातोरात अचानक बनकर तैयार नहीं हो जाता। जिन जिम्मेदार अफसरों का काम यह सुनिश्चित करना है कि ऐसे अवैध निर्माण न हों, वही राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण के चलते बिल्डरों की बेईमानी पर जानबूझकर आंखें मूंद लेते हैं।

अदालत ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि भ्रष्ट अधिकारी पहले तो अनुचित तरीकों से अवैध मकानों के निर्माण को सुगम बनाते हैं और इसके बदले मोटी रिश्वत वसूलते हैं। बाद में जब कार्रवाई का समय आता है, तो उन निर्दोष या बेखबर खरीदारों को कानूनी डंडे से बर्बाद होने के लिए उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है। इस प्रकार की व्यवस्था में मुख्य दोषी बच निकलते हैं और आम नागरिक पिसता है।

इन्हीं सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए जस्टिस श्रीधरन ने एक कड़ा निर्देश प्रस्तावित किया कि अब किसी व्यक्ति पर प्राथमिकी (FIR) दर्ज होने की तिथि से अगले दो वर्षों तक सरकार उसके खिलाफ घर गिराने जैसी कोई भी दंडात्मक कार्रवाई नहीं कर सकेगी। हालांकि, इस विशिष्ट निर्देश पर पीठ के साथी न्यायाधीश जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने अपनी असहमति दर्ज कराई, जिससे इस कानूनी पहलू पर गहन विमर्श की आवश्यकता रेखांकित होती है।

इसके साथ ही, जस्टिस अतुल श्रीधरन ने देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ भी कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि भारत ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल 2025 की रिपोर्ट में 182 देशों की सूची में 91वें स्थान पर है, लेकिन यह शर्मनाक स्थिति भी हमारे समाज को विचलित नहीं करती। आम जनता ने भ्रष्टाचार को एक ‘न्यू नॉर्मल’ यानी सामान्य बात मान लिया है और जब तक कोई रंगे हाथों पकड़ा नहीं जाता, तब तक उसे गलत भी नहीं माना जाता।

अयोध्या के राम मंदिर में दान की चोरी से जुड़े हालिया विवाद पर दु:ख व्यक्त करते हुए न्यायाधीश ने कहा कि यह घटना भारतीय ईमानदारी के सबसे निचले स्तर को दर्शाती है। जिस समाज को राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी जैसी घटना भी अंदर से नहीं हिला सकती, उसे दुनिया की कोई भी बात शर्मिंदा नहीं कर सकती। यह घटना देशवासियों के नैतिक मूल्यों और ईमानदारी में आई भारी गिरावट का स्पष्ट प्रमाण है।

भ्रष्टाचार के इस व्यापक दलदल से देश को बाहर निकालने के लिए अदालत ने अभूतपूर्व सुझाव दिए। जस्टिस श्रीधरन ने कहा कि यदि राज्य वास्तव में भ्रष्टाचार को खत्म करने के प्रति गंभीर है, तो उसे ‘भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988’ की धारा 46 में आवश्यक संशोधन करने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि भ्रष्टाचार के संगीन मामलों में दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों के लिए मृत्युदंड  का प्रावधान किया जाना चाहिए।

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