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Shimla News : शिमला में बागवानों का उग्र प्रदर्शन: सेब के पेड़ों के कटान के खिलाफ सड़कों पर उतरे किसान

Shimla News : शिमला में बागवानों का उग्र प्रदर्शन: सेब के पेड़ों के कटान के खिलाफ सड़कों पर उतरे किसान
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Shimla News : हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में आज, 29 जुलाई 2025 को हिमाचल किसान सभा सेब उत्पादक संघ, और सीपीआई के बैनर तले सैकड़ों बागवानों ने सचिवालय के बाहर जोरदार प्रदर्शन किया। बागवानों का गुस्सा वन भूमि पर सेब के पेड़ों के कटान के हिमाचल उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ था, जिस पर हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने रोक लगा दी है।

बागवान इस मामले में राज्य सरकार से बेदखली और घरों की तालाबंदी पर स्थायी रोक की मांग कर रहे हैं।इस दौरान प्रदर्शन कर रहे बागवानों से पुलिस की धक्कामुक्की भी हुई पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को सचिवालय का घेराव करने से रोका तो उन्होंने पुलिस के बेरिगेट को उठाकर निचे फैंक दिया।

इस दौरान पूर्व विधायक राकेश सिंघा ने कहा कि यह आंदोलन दो दिन का नहीं है। उन्होंने कहा कि हिमाचल के दो केसों में सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा है कि डीएफओ द्वारा लोगों की बेदखली गैरकानूनी है। उन्होंने कहा कि आज भारी मन से दुखी हूं कि इस पर न तो कोर्ट रोक लगा पाया और न ही सरकार।

उसके बाद नीता राम के मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले को इकट्ठा कर इसे बड़ी बेंच के पास भेजा जाएगा और तब तक यथास्थिति बनाए रखनी है। लेकिन इस बात को न तो कोर्ट ने माना और न ही सरकार ने।

पिछले कल सुप्रीम कोर्ट ने टिकेन्द्र पंवर की याचिका पर सुनवाई के बाद सेब के पेड़ों की कटाई पर रोक लगाई है। उन्होंने कहा कि आज हम सरकार से पूछने आए हैं कि आप सुप्रीम कोर्ट के आदेश मानेंगे या नहीं। अगर नहीं मानेंगे, तो हमें इस पर हाईकोर्ट और सरकार दोनों से जवाब चाहिए। उसके बाद हम अपनी अगली नीति तय करने वाले हैं।

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उन्होंने कहा कि सरकार की जेलों में इतनी जगह नहीं होगी, जितने लोग जेल जाने की ताकत रखते हैं। उन्होंने कहा कि 1980 के बाद जो भी सरकार हिमाचल में आई है, उसने अपना दायित्व नहीं निभाया है। आज तक जो भी सरकारें 1980 के बाद रही हैं, वे अपंग सरकारें रही हैं।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति महोदय से भी यह बात पूछना चाहता हूं—क्या कोई ऐसा राज्य है जहाँ चुनी हुई सरकार दो बिस्वा भूमि भी नहीं दे सकती?,  उन्होंने कहा कि 1952 के वन भूमि अधिनियम के तहत सारी भूमि को जंगल घोषित कर दिया गया। मुझे बताइए, ऐसे में गरीब लोग जाएं तो जाएं कहाँ?

इसलिए यह हक की लड़ाई होने वाली है और यह बात सरकार और कोर्ट को तय करनी है कि वे इस लड़ाई को कितनी लंबी ले जाना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि अगर इस देश में संयुक्त किसान मोर्चा 700 से अधिक शहादतें देकर एक साल से अधिक समय तक आंदोलन चला सकता है और तीन काले कानूनों की वापसी की मांग को मनवा सकता है, तो ऐसे ही बागवानों का यह संघ भी अपने हक की लड़ाई के लिए लंबा आंदोलन चला सकता है।

उन्होंने कोर्ट और सरकार पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि आज सिस्टम में ऐसे लोग भरे पड़े हैं जिन्हें बागवानों का दर्द समझ नहीं आता। सिंघा ने कहा कि आज कई गरीब परिवार सुप्रीम कोर्ट नहीं जा सकते। ऐसे में हाईकोर्ट और सरकार को सुप्रीम कोर्ट का फैसला समझना चाहिए। अपने हक की लड़ाई के लिए हम बड़े-बड़े आंदोलन करने की क्षमता रखते हैं।

सेब के पेड़ों के कटान पर बवाल

दरअसल हिमाचल उच्च न्यायालय ने 2 जुलाई 2025 को वन भूमि पर अवैध रूप से लगाए गए सेब के पेड़ों को काटने का आदेश दिया था, जिसके बाद जिला शिमला के ऊपरी इलाकों में कार्रवाई शुरू हुई। मंडी के करसोग में भी दूसरे चरण में कटान की तैयारी थी।

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लेकिन, शिमला के पूर्व उप-महापौर और पर्यावरणविद टिकेंद्र पंवर की याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने इस आदेश पर 28 जुलाई को रोक लगा दी। बागवान नेता संजय चौहान ने इसे बागवानों के लिए बड़ी राहत बताया, लेकिन उनका कहना है कि जब तक सरकार उनकी जमीनों को नियमित करने और बेदखली रोकने का ठोस कदम नहीं उठाती, उनका आंदोलन जारी रहेगा।

सचिवालय के बाहर हंगामा

आज सुबह हिमाचल किसान सभा के नेतृत्व में बागवानों ने पंचायत घर से चौड़ा मैदान तक मार्च निकाला। इस दौरान “बागवानों को उजड़ने नहीं देंगे” और “सेब हमारी आजीविका, सरकार सुनो हमारी पुकार” जैसे नारे गूंजे। इस दौरान सुक्खू सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए प्रदर्शनकारियों ने सरकार पर किसानों की अनदेखी का आरोप लगाया और मांग की कि उनकी कब्जे वाली भूमि को नियमित किया जाए ताकि उनकी आजीविका बची रहे। किसानों का कहना है कि सेब की खेती उनकी रोजी-रोटी का आधार है, और पेड़ों का कटान उनके लिए तबाही से कम नहीं।

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