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Iran Israel War: जानिए सीजफायर विफल होने की वजह, इरान-इजराइल संघर्ष में पलटा वैश्विक शक्ति का समीकरण

Iran Israel Conflict: इरान और इजराइल के बीच घोषित युद्धविराम दो घंटे भी नहीं टिक सका। इस घटना के बाद मध्य पूर्व की भू-राजनीति में बड़े बदलावों के संकेत मिल रहे हैं, जो सीधे तौर पर वैश्विक अर्थव्यवस्था और विश्व व्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं।
Published on: 21 April 2026
Iran Israel War: जानिए सीजफायर विफल होने की वजह, इरान-इजराइल संघर्ष में पलटा वैश्विक शक्ति का समीकरण

Iran Israel War: इरान और इजराइल के बीच हाल ही में घोषित युद्धविराम समझौता महज दो घंटे में ही पूरी तरह विफल हो गया। जैसे ही इस समझौते की शर्तें और बिंदु सार्वजनिक हुए, इजराइली राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई। इजराइल के कई वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से इसे देश की पिछले 70 वर्षों की सबसे बड़ी रणनीतिक हार करार दिया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह सीजफायर टिक जाता, तो मध्य पूर्व और वैश्विक शक्ति संतुलन में तीन बड़े बदलाव निश्चित थे। पहला, यदि इरान और इजराइल के बीच शांति स्थापित होती, तो इरान एक प्रमुख वैश्विक शक्ति केंद्र के रूप में उभरता। दूसरा, इस घटनाक्रम का सीधा असर इजराइल की घरेलू राजनीति पर पड़ता, जहाँ बेंजामिन नेतन्याहू की गठबंधन सरकार के पतन की संभावना बढ़ गई थी।

तीसरा, इस क्षेत्र में इरान की मजबूती का सीधा अर्थ अमेरिका के वैश्विक सुपरपावर स्टेटस के लिए एक बड़ी चुनौती होता। बता दें कि लगभग चालीस दिन पूर्व, जब अमेरिका और इजराइल ने इरान के विरुद्ध संयुक्त सैन्य अभियान शुरू किया था, तो उनके तीन मुख्य उद्देश्य थे: इरान के संवर्धित यूरेनियम भंडारों पर नियंत्रण पाना, वहां रिजीम चेंज (सत्ता परिवर्तन) सुनिश्चित करना, और वेनेजुएला की तर्ज पर इरान के तेल संसाधनों पर कब्जा करना।

हालांकि, इन चालीस दिनों के संघर्ष में ये तीनों ही उद्देश्य विफल साबित हुए हैं। इसके विपरीत, इरान के लोग मौजूदा प्रशासन के साथ और अधिक एकजुट होकर खड़े हो गए हैं। सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक बदलाव स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर इरान का नियंत्रण है। यह जलमार्ग दुनिया के 20 प्रतिशत से अधिक तेल व्यापार का मुख्य मार्ग है।

सीजफायर के विफल होते ही इजराइल में नेतन्याहू सरकार पर दक्षिणपंथी मंत्रियों का दबाव बढ़ गया है। वित्त और रक्षा मंत्री, जो नेतन्याहू की सरकार में प्रमुख भागीदार हैं, अब इरान और लेबनान दोनों मोर्चों पर ‘टोटल रीसेट’ यानी पूर्ण सैन्य कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। यही कारण है कि किसी भी समझौते को जमीन पर लागू नहीं होने दिया जा रहा।

उल्लेखनीय है कि अमेरिका के लिए यह संघर्ष अपनी 50 साल पुरानी सत्ता बचाने की लड़ाई बन चुका है। इतिहासकार 1956 के सूएज नहर विवाद का उदाहरण देते हैं, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य के पतन की शुरुआत की थी। विश्लेषकों का तर्क है कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज का महत्व सूएज नहर से कई गुना अधिक है। यदि यह मार्ग इरान के पूर्ण नियंत्रण में रहता है, तो यह वैश्विक पेट्रो-डॉलर सिस्टम के लिए एक बड़ा झटका होगा, जिस पर पिछले पांच दशकों से अमेरिका का वैश्विक वित्तीय प्रभुत्व टिका हुआ है।

वर्तमान स्थिति यह है कि इरान ने न केवल इजराइल और अमेरिका के संयुक्त प्रयासों को विफल किया है, बल्कि दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण चोक पॉइंट पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। यदि यह स्थिति बनी रहती है, तो आने वाले समय में वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में भारी उछाल, सप्लाई चेन में गंभीर व्यवधान और एक नई विश्व व्यवस्था के उदय की संभावना प्रबल है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या अमेरिका और इजराइल फिर से बड़े हमले की रणनीति बनाएंगे या इरान की इस नई शक्ति को स्वीकार करेंगे।

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