Himachal News: हिमाचल प्रदेश के सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों के आंकड़ों को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पूरे शिक्षा विभाग में हड़कंप मचा दिया है। बता दें कि प्रदेश में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की बजट घोषणा के तहत प्री-प्राइमरी से लेकर 12वीं कक्षा तक के सभी विद्यार्थियों को पानी की बोतलें उपलब्ध करवाने की योजना शुरू की जा रही है।
इस योजना के क्रियान्वयन के लिए जब शिक्षा विभाग ने विद्यार्थियों की संख्या जुटाने की प्रक्रिया शुरू की, तो विभागीय आंकड़ों में एक बड़ा और चौंकाने वाला अंतर देखने को मिला। महज ढाई महीने के भीतर सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या में करीब 50 हजार की भारी कमी दर्ज की गई है। इस विसंगति के सामने आने के बाद खुद विभागीय अधिकारी भी हैरान हैं और अब आंकड़ों की दोबारा जांच की जा रही है।

विभागीय रिकॉर्ड के अनुसार, 17 अप्रैल 2026 को प्रदेश के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की कुल संख्या 7,68,037 दर्ज की गई थी। इसके बाद जब 9 जुलाई 2026 को पानी की बोतल वितरण योजना के लिए यू-डाइस (U-DISE) पोर्टल के माध्यम से नए आंकड़े जुटाए गए, तो यह संख्या घटकर केवल 7,18,559 रह गई। इस प्रकार दो अलग-अलग तारीखों के रिकॉर्ड में सीधे तौर पर 49,478 विद्यार्थियों का बड़ा अंतर सामने आया है।
इतनी बड़ी संख्या में छात्रों का रिकॉर्ड कम होने से प्रशासनिक स्तर पर हड़कंप मच गया है और निदेशालय को अपने ही तैयार किए गए आंकड़ों पर दोबारा समीक्षा करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री द्वारा बजट में की गई इस बड़ी घोषणा के बाद स्कूल शिक्षा निदेशालय ने राज्य के सभी जिलों से विद्यार्थियों की करंट संख्या मांगी थी ताकि बोतलों की खरीद प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सके।
जिलों से प्राप्त अलग-अलग रिपोर्टों का जब निदेशालय स्तर पर संकलन किया गया, तब जाकर आंकड़ों का यह गंभीर मिसमैच पकड़ में आया। इस गंभीर लापरवाही और विसंगति को देखते हुए स्कूल शिक्षा निदेशालय ने तुरंत कड़ा संज्ञान लिया है। निदेशालय ने तत्काल प्रभाव से सभी जिला उप शिक्षा निदेशकों को पत्र जारी कर संशोधित और पूरी तरह से सत्यापित रिपोर्ट केवल दो दिन के भीतर भेजने के सख्त निर्देश दिए हैं।
बता दें कि पानी की बोतलों की खरीद और उनके वितरण की आधिकारिक प्रक्रिया शुरू करने से पहले विभाग के लिए विद्यार्थियों की सटीक और सही संख्या तय करना बेहद जरूरी था। नियमों के मुताबिक, विद्यार्थियों की इसी अंतिम संख्या के आधार पर ही पानी की बोतलों की खरीद के लिए टेंडर प्रक्रिया पूरी कर संबंधित एजेंसी को ऑर्डर जारी किया जाना है।
यदि सरकारी रिकॉर्ड के यह आंकड़े गलत रहते हैं, तो जमीनी स्तर पर दो बड़ी समस्याएं खड़ी हो सकती हैं। या तो हजारों विद्यार्थियों के लिए बोतलें कम पड़ जाएंगी, या फिर जरूरत से ज्यादा बोतलें खरीदने के कारण सरकारी धन का भारी और अनावश्यक व्यय हो जाएगा। इसी वित्तीय और प्रशासनिक जोखिम से बचने की कवायद के दौरान यह विसंगति पकड़ी गई।
इस बड़े खुलासे के बाद अब शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों को एक और गहरी आशंका सताने लगी है। अधिकारियों का मानना है कि यदि विद्यार्थियों की कुल संख्या को लेकर इतने बड़े पैमाने पर विसंगति मौजूद है, तो विभाग की अन्य महत्वपूर्ण योजनाएं भी प्रभावित हो सकती हैं।
सरकारी स्कूलों में चल रही मिड-डे मील योजना, छात्रों को मिलने वाली छात्रवृत्ति, मुफ्त पाठ्यपुस्तक वितरण, स्कूल यूनिफॉर्म और अन्य तमाम छात्र कल्याण योजनाओं के लिए भी इन्हीं आंकड़ों का उपयोग किया जा रहा है। ऐसे में अब इन सभी योजनाओं के लिए इस्तेमाल हो रहे डाटा की भी दोबारा से नए सिरे से समीक्षा करनी पड़ सकती है ताकि किसी भी प्रकार के घोटाले या गड़बड़ी की गुंजाइश न रहे।
यू-डाइस (U-DISE) को देश की सबसे महत्वपूर्ण और विश्वसनीय शैक्षणिक डाटा प्रणाली माना जाता है। केंद्र और राज्य सरकारों की अधिकांश शैक्षणिक नीतियां, बजट का आवंटन और नई योजनाएं इसी पोर्टल के आंकड़ों के आधार पर तैयार की जाती हैं। ऐसे में यदि हिमाचल प्रदेश के जमीनी रिकॉर्ड और इस महत्वपूर्ण पोर्टल पर उपलब्ध आंकड़ों में लगभग 50 हजार छात्रों का अंतर मिलता है, तो यह केवल एक सामान्य प्रशासनिक चूक नहीं है। यह पूरी डाटा प्रबंधन प्रणाली की साख और कार्यप्रणाली के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस पूरे मामले पर स्कूल शिक्षा निदेशक आशीष कोहली ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि सरकार की इस योजना का लाभ हर पात्र विद्यार्थी तक बिना किसी बाधा के पहुंचाना विभाग की प्राथमिकता है। इसके लिए नामांकन आंकड़ों की सटीकता और सत्यता सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। इसी वजह से सभी जिलों से दोबारा से नए और सत्यापित आंकड़े मांगे गए हैं ताकि अंतिम रिपोर्ट के आधार पर ही आगे की कार्रवाई की जा सके।


















