Himachal Pradesh High Court Defamation Case: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पत्रकारिता और मीडिया की स्वतंत्रता से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि सच्चे और निर्विवाद तथ्यों पर आधारित समाचार प्रकाशित करना मानहानि की श्रेणी में नहीं आता है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि यदि समाचार प्रकाशन से संबंधित व्यक्ति का पक्ष या स्पष्टीकरण भी अखबार द्वारा प्रमुखता से छापा गया है, तो मानहानि का मामला नहीं बनता है।
दरअसल यह फैसला जस्टिस संदीप शर्मा की एकल पीठ द्वारा एक अखबार के संपादक के खिलाफ दायर आपराधिक शिकायत को खारिज करते हुए सुनाया गया। जानकारी के मुताबिक इस पूरे प्रकरण की शुरुआत तब हुई जब प्रवीण कुमार सैनी को ग्राम पंचायत सदरपुर का प्रधान चुना चुने गए थे और उस समय होम गार्ड के रूप में भी कार्यरत थे। इसी दोहरी स्थिति को लेकर उनके एक चुनावी प्रतिद्वंद्वी ने उनकी प्रशासनिक पात्रता और वैधानिकता पर गंभीर सवाल खड़े किए।
इन परिस्थितियों के बीच, ‘दिव्य हिमाचल’ समाचार पत्र में एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई जिसमें यह तथ्य सामने रखा गया कि सैनी होम गार्ड में रहते हुए ही पंचायत प्रधान के पद पर काबिज हुए हैं। इस खबर के प्रकाशन के बाद संबंधित पंचायत प्रधान प्रवीण कुमार सैनी ने आपत्ति जताई। उनका दावा था कि उन्होंने प्रकाशन से पूर्व अखबार को अपने विभाग से संबंधित अनापत्ति प्रमाण पत्र यानी एनओसी (NOC) दिखाई थी।
सैनी का तर्क था कि इसके बावजूद इस तरह की खबर छापना उनकी छवि को धूमिल करने और मानहानि के अंतर्गत आता है। इस विवाद के तूल पकड़ने पर उन्होंने अखबार के स्थानीय संवाददाता, संपादक और अन्य संबंधित लोगों के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 501, 502 और आपराधिक षड्यंत्र के तहत धारा 120-B के अंतर्गत अदालत में आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी।
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों के तर्कों और साक्ष्यों का बारीकी से परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि प्रवीण कुमार सैनी का एक ही समय में होम गार्ड के रूप सेवारत रहना और साथ ही पंचायत प्रधान का पद संभालना दोनों ही पक्ष पूरी तरह से सच्चे और निर्विवाद तथ्य थे। इन तथ्यों पर किसी भी प्रकार का विवाद नहीं था। इसके साथ ही, अदालत ने इस बात को भी रेखांकित किया कि अखबार ने खबर प्रकाशित करने से पहले उनकी प्रतिक्रिया और पक्ष जानने का पूरा प्रयास किया था।
अखबार ने न केवल उनका पक्ष मांगा, बल्कि उनके द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण को भी अपने प्रकाशन में उचित स्थान देकर प्रकाशित किया था। न्यायालय ने अपने आदेश में इस बात पर भी विशेष जोर दिया कि संपादक या अन्य मीडियाकर्मियों के खिलाफ किसी भी प्रकार से शिकायतकर्ता को बदनाम करने की सोची-समझी साजिश रचने का प्रथम दृष्टया कोई भी ठोस आधार अदालत के समक्ष नहीं आया।
इन सभी कानूनी पहलुओं और साक्ष्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि इस मामले में आगे कानूनी कार्यवाही जारी रखना न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा। तदनुसार, अदालत ने संपादक के खिलाफ चल रही सम्पूर्ण कार्यवाही, शिकायत और आरोप तय करने से संबंधित निचली अदालत के आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया।

















