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Chester Hills Solan Land Controversy: मुख्य सचिव की कुर्सी पर संकट ?, सोलन में 275 बीघा जमीन सरकारी कब्जे में लेने की प्रक्रिया शुरू

Chester Hills Solan Land Dispute: सोलन के चर्चित चेस्टर हिल प्रोजेक्ट में धारा 118 के उल्लंघन पर 275 बीघा जमीन 'वेस्ट' करने की कार्रवाई शुरू हो गई है। इस मामले में मुख्य सचिव संजय गुप्ता द्वारा जांच रोकने के आदेश ने उनकी भूमिका पर गंभीर कानूनी सवाल खड़े कर दिए
Chester Hills Solan Land Controversy: मुख्य सचिव की कुर्सी पर संकट ?, सोलन में 275 बीघा जमीन सरकारी कब्जे में लेने की प्रक्रिया शुरू
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Chester Hills Solan Land Controversy: हिमाचल प्रदेश के सोलन में स्थित चर्चित चेस्टर हिल जमीन विवाद ने अब एक बड़ा सियासी और प्रशासनिक तूफान खड़ा कर दिया है, जिसकी आंच सीधे राज्य के मुख्य सचिव संजय गुप्ता तक पहुंच गई है। बता दें कि सोलन के उपायुक्त ने हिमाचल प्रदेश काश्तकारी और भूमि सुधार अधिनियम की धारा 118 के उल्लंघन के मामले में 275 बीघा जमीन को सरकार के नाम करने यानी ‘वेस्ट’ करने की कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी है।

दरअसल, इस पूरे प्रकरण में मुख्य सचिव की भूमिका तब सवालों के घेरे में आई जब उन्होंने पिछले साल 6 दिसंबर को एसडीएम और डीसी की कार्रवाई पर रोक लगाने का आदेश जारी किया था। कानून के जानकारों का स्पष्ट मानना है कि इस तरह की प्रशासनिक कार्रवाई को रोकने का अधिकार सिर्फ जिला न्यायालय के पास होता है, न कि मुख्य सचिव के पास।

इसी तकनीकी पेंच और पद के कथित दुरुपयोग ने अब मुख्य सचिव की कुर्सी को खतरे में डाल दिया है। उल्लेखनीय है कि यह सारा विवाद अगस्त 2024 में राजीव शांडिल की एक शिकायत से शुरू हुआ था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि चेस्टर हिल प्रोजेक्ट के लिए करीब 275 बीघा जमीन उन स्थानीय लोगों के नाम पर खरीदी गई जिनके पास खुद दो बीघा जमीन भी नहीं है।

असल में इस बेनामी सौदे के पीछे बाहरी लोगों का पैसा लगा था। मामला उजागर होने के बाद एसडीएम सोलन डॉ. पूनम की जांच में यह कड़वा सच सामने आया कि कागजों पर तो जमीन स्थानीय किसानों की थी, लेकिन वहां फ्लैट एक गैर-कृषक फर्म बना रही थी।

वित्तीय अनियमितता का आलम यह था कि फ्लैटों की बिक्री से आने वाली 90 प्रतिशत रकम सीधे डेवलपर की जेब में जा रही थी और जिस किसान को करोड़ों की जमीन का मालिक दिखाया गया था, उसकी अपनी आय का कोई ठोस जरिया ही नहीं था। प्रशासनिक गलियारों में इस मामले ने तब और तूल पकड़ा जब नियमों की अनदेखी कर बाहरी व्यक्तियों को जमीन हस्तांतरित करने और रेरा के नियमों को ताक पर रखने की बात पुख्ता हुई।

जांच रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि इस पूरे खेल में स्थानीय अधिकारियों की मिलीभगत और भारी लापरवाही रही है। हालांकि मामला जब उजागर हुआ, तो विपक्षी दलों भाजपा-माकपा और जनता ने जब इस पर सवाल खड़े किए तो, अब सरकार डैमेज कंट्रोल की मुद्रा में है और मुख्य सचिव के उस विवादित आदेश को रोक दिया गया है जिसने जांच की गति थाम दी थी।

सूत्रों की मानें तो इस प्रोजेक्ट में बेनामी संपत्ति के इस्तेमाल को देखते हुए प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी से जांच कराने तक की सिफारिश की जा चुकी है, ताकि यह पता चल सके कि निवेश के लिए करोड़ों का यह पैसा आखिर आया कहां से था। वही यह मामला अब केवल प्रशासनिक जांच तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह कानूनी लड़ाई में तब्दील हो चुका है।

वरिष्ठ अधिवक्ता विनय शर्मा का आरोप है कि मुख्य सचिव ने न केवल अपने पद का दुरुपयोग किया, बल्कि खरड़ में 70 करोड़ रुपये की बेशकीमती जमीन को महज डेढ़ करोड़ रुपये में खरीदने के मामले में भी उनकी भूमिका संदिग्ध है। इसी को लेकर अब हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर पूरे मामले की सीबीआई जांच की मांग की जा रही है।

हालांकि, मुख्य सचिव संजय गुप्ता ने इन तमाम आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इन्हें झूठ का पुलिंदा करार दिया है। उनका कहना है कि उन्होंने किसी जांच को नहीं रोका और इस मामले में अपील का रास्ता खुला था, लेकिन फिलहाल सरकार के सख्त रुख और डीसी सोलन की तैयार हो रही रिपोर्ट ने उनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

बता दें कि चुनावी वर्ष से पहले भाजपा इस मुद्दे को जमीनी स्तर पर भुनाने की पूरी कोशिश करेगी। उनके नेताओं के बयानों से इस बात के साफ संकेत मिलते हैं। हालांकि, देखने वाली बात यह होगी कि सुक्खू सरकार इस मामले में क्या सख्त कदम उठाती है। चूंकि दिसंबर 2027 में हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव होने हैं, इसलिए भाजपा इस बड़े भ्रष्टाचार के मामले को लंबा खींचने की कोशिश करेगी, जिससे सुक्खू सरकार की कार्यप्रणाली और उसकी साख लोगों की नजर में कम हो सके।

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