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NEET Paper Leak पर फास्ट ट्रैक कोर्ट सख्त: वकील AP Singh बोले – NTA के पास असली गुनहगार, ‘निर्भया केस जैसी हो रही जल्दबाजी’

NEET UG 2026 Paper Leak: नीट यूजी 2026 पेपर लीक मामले में विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट ने राज्य का पक्ष रखने के लिए अभियोजक नियुक्त करने का निर्देश दिया है। वहीं आरोपी पक्ष ने खुद को पूरी तरह निर्दोष बताया है।
Published on: 27 July 2026
NEET Paper Leak पर फास्ट ट्रैक कोर्ट सख्त, तो वकील AP Singh बोले-"NTA के पास असली गुनहगार, CBI ने बेगुनाहों को जेल भेजा...

Fast Track Court  NEET Paper Leak Case Hearing: नीट-यूजी 2026 पेपर लीक मामले में विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट ने अभियोजन निदेशक को निर्देश दिया है कि वे अदालत में राज्य का प्रतिनिधित्व करने के लिए जल्द से जल्द एक अभियोजक की नियुक्ति करें। यह कानूनी प्रक्रिया मामले की निष्पक्ष और त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करने के उद्देश्य से शुरू की गई है। अदालत प्रशासन ने इस संबंध में आवश्यक दिशानिर्देश जारी कर दिए हैं ताकि आगामी कार्यवाही में राज्य सरकार का पक्ष मजबूती और स्पष्टता से रखा जा सके।

इस बीच, अदालत ने मामले के प्रमुख आरोपियों में शामिल दिनेश बिवाल और विकास बिवाल की जमानत याचिका पर सुनवाई स्थगित कर दी है। अदालत के शेड्यूल के अनुसार, अब इस याचिका पर अगली सुनवाई 3 अगस्त को होगी। आरोपी पक्ष के कानूनी दल ने अदालत के समक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत किया और प्रक्रियात्मक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही।

मामले की सुनवाई के दौरान आरोपियों के वकील, एडवोकेट एपी सिंह ने मीडिया और अदालत के सामने अपना रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि नई फास्ट-ट्रैक अदालतें भारत सरकार द्वारा लागू की गई नई व्यवस्था, प्रक्रिया और कानूनों के अनुसार हाल ही में स्थापित की गई हैं। एडवोकेट सिंह का तर्क था कि जब भी विरोध प्रदर्शनों, जन दबाव, जंतर-मंतर पर धरनों या संसदीय हंगामे के बाद कोई कानून बनाया जाता है, तो उसमें जल्दबाजी अपरिहार्य हो जाती है। ऐसी प्रक्रियात्मक जल्दबाजी कई बार न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा से समझौता कर देती है।

बचाव पक्ष के वकील ने दावा किया कि दिनेश बिवाल और विकास बिवाल इस पूरे मामले में पूरी तरह निर्दोष हैं। उन्होंने वर्तमान कानूनी कार्यवाही की तुलना पूर्व के चर्चित मामलों से करते हुए कहा कि हम अभी शुरुआती चरण में हैं, ठीक वैसे ही जैसे निर्भया मामले में फास्ट-ट्रैक अदालत की कार्यवाही की शुरुआत हुई थी। उस समय शामिल जल्दबाजी के परिणामों को सभी ने देखा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि आरोपियों के खिलाफ कोई ठोस सबूत मौजूद नहीं है।

एडवोकेट एपी सिंह ने आगे कहा कि पुलिस कस्टडी रिमांड कार्यवाही में भाग लेने के बावजूद पुलिस या जांच एजेंसियों को कोई बरामदगी नहीं हुई है। आरोपियों के खिलाफ न तो कोई मनी ट्रेल (धन का लेन-देन) मिला है, न कोई कॉल डिटेल्स, न कोई फोटोग्राफ और न ही किसी प्रकार की वीडियोग्राफी मौजूद है। बचाव पक्ष के अनुसार, जांच एजेंसियों के पास दोनों आरोपियों को घटना से जोड़ने वाला कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं है।


जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) ने मामले में शुरुआत में ही 47 लोगों को निलंबित किया था। इसके बाद पेपर लीक करने और उसे एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाने में शामिल अन्य लोगों की गिरफ्तारियां हुई थीं। अधिकारियों के पास उन वास्तविक आरोपियों के बारे में सभी प्रासंगिक सबूत और विवरण मौजूद हैं और वही असली अपराधी हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सीबीआई ने जैसे ही जांच संभाली, उन्होंने बिना पर्याप्त सबूत के तीनों को हिरासत में लेकर बंद कर दिया।

अंत में, बचाव पक्ष ने न्यायशास्त्र के मूलभूत सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि ‘सभी के लिए न्याय तक पहुंच’ और ‘जमानत नियम है, जेल अपवाद’ के सिद्धांतों को इस मामले में नजरअंदाज किया गया है। कानून का नियम यह कहता है कि यदि कोई व्यक्ति जमानत की सभी आवश्यक कानूनी शर्तों को पूरा करता है, तो उसे जमानत दी जानी चाहिए। फिलहाल, सभी पक्षों की नजरें 3 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं।

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