Himachal High Court Decision: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने आबकारी मामलों को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को स्पष्ट किया है। अदालत ने अपने एक ऐतिहासिक निर्णय में कहा है कि यदि वैध परमिट के तहत परिवहन की जा रही शराब की कुछ बोतलों पर फैक्ट्री कर्मचारियों की गलती से गलत बैच नंबर अंकित हो जाता है, तो मात्र इस तकनीकी आधार पर उसे अवैध परिवहन का मामला नहीं माना जाएगा।
कोर्ट ने साफ किया कि ऐसी स्थिति में हिमाचल प्रदेश एक्साइज़ एक्ट की धारा 39 के तहत आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है। दरअसल,यह बड़ा फैसला जस्टिस संदीप शर्मा की एकल पीठ ने ‘मणिक कुमार बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य’ मामले की सुनवाई के दौरान सुनाया। इस मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, इंडियन मेड फॉरेन लिकर (IMFL) के कुल 400 बॉक्स एक वैध परमिट के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाए जा रहे थे।
हालांकि रास्ते में नियमित जांच के दौरान अधिकारियों ने पाया कि कुछ बोतलों पर अलग-अलग बैच नंबर अंकित थे। इसी भिन्नता को आधार बनाकर संबंधित पक्ष पर अवैध ट्रांसपोर्ट का आरोप मढ़ दिया गया था। न्यायालय के समक्ष सुनवाई के दौरान इस मामले से जुड़े वास्तविक तथ्य सामने आए। कोर्ट को बताया गया कि जांच के दायरे में आई संबंधित बोतलें वास्तव में बैच नंबर 15 के उत्पादन का हिस्सा थीं।
हालांकि, पैकेजिंग और लेबलिंग प्रक्रिया के दौरान फैक्ट्री कर्मचारियों से एक मानवीय चूक हो गई थी, जिसके कारण उन बोतलों पर गलती से बैच नंबर 9 और बैच नंबर 14 अंकित हो गए थे। हाईकोर्ट ने इन तथ्यों का गहराई से अध्ययन करने के बाद पाया कि जब पूरा कंसाइनमेंट एक वैध और वैध प्राधिकारी द्वारा जारी परमिट के तहत ही परिवहन किया जा रहा था, तब केवल बैच नंबर की इस प्रकार की तकनीकी त्रुटि को अवैध परिवहन का मुख्य आधार नहीं बनाया जा सकता है।
हाईकोर्ट के जस्टिस संदीप शर्मा ने अपने फैसले में कानूनी स्थिति को और स्पष्ट करते हुए कहा कि यदि इस तरह की गलती किसी नियम के उल्लंघन की श्रेणी में आती भी है, तो उसे सीधे तौर पर धारा 39 के तहत आपराधिक श्रेणी में नहीं रखा जा सकता; इसे अधिकतम धारा 43 के प्रावधानों के तहत ही देखा जा सकता है। इसके अलावा, इस मामले में एक और पहलू भी सामने आया था। जांच के दौरान कंसाइनमेंट में दो अतिरिक्त बॉक्स ऐसे भी पाए गए थे, जो बिना किसी वैध परमिट के परिवहन किए जा रहे थे।
इस विशिष्ट बिंदु पर हाईकोर्ट ने स्वीकार किया कि आबकारी विभाग द्वारा इस संबंध में कार्रवाई दर्ज करने में कोई कानूनी त्रुटि नहीं थी। लेकिन इसके साथ ही, एक्साइज़ एक्ट की धारा 66 और धारा 67 का बारीक विश्लेषण करने के बाद हाईकोर्ट ने यह भी माना कि यह संबंधित अपराध कानूनन समझौता-योग्य श्रेणी का था। ऐसे में इस मामले को लेकर बहुत लंबी आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना किसी भी प्रकार से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
माननीय अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा कि इस मामले में दर्ज प्राथमिकी (FIR) को आगे भी बनाए रखने से किसी भी सार्थक उद्देश्य की पूर्ति नहीं होगी। इसके विपरीत, यदि इस कार्यवाही को जारी रखा जाता है, तो याचिकाकर्ता को एक लंबी और अनावश्यक मुकदमेबाजी के मानसिक और आर्थिक दौर से गुजरना पड़ेगा। इसी तार्किक आधार को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने मामले से जुड़ी FIR और उससे संबंधित पूरी आपराधिक कार्यवाही को तत्काल प्रभाव से रद्द करने का आदेश जारी कर दिया।

















